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राष्ट्रीय

एपीसीआर ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज किए जाने की कड़ी निंदा की। सभी राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई की मांग।

Awaze Bihar3 मिनट पढ़ें

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (एपीसीआर) ने दिल्ली दंगों के कथित 'बड़ी साजिश' मामले में छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज किए जाने पर गहरी चिंता, अफसोस और नाराजगी व्यक्त की है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सोमवार को अपना फैसला सुनाते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद सालिम, शफा उर रहमान और शादाब अहमद को बारह सख्त शर्तों के साथ जमानत दे दी गई।

एपीसीआर ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद सालिम, शफा उर रहमान और शादाब अहमद की जमानत पर रिहाई का स्वागत किया है। संगठन ने स्पष्ट किया कि मीरान हैदर, मोहम्मद सालिम और शादाब अहमद के मामलों में एपीसीआर ने पूरी कानूनी सहायता और निरंतर पैरवी की। वर्षों तक बिना मुकदमा चले जेल में रहने के बाद उनकी रिहाई एक हद तक राहत का कारण है, हालांकि उमर खालिद और शरजील इमाम की लगातार जेल इस राहत को बहुत खराब कर देती है।

एपीसीआर के अनुसार उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज करना अन्यायपूर्ण, असमान व्यवहार और ठोस कानूनी आधार से वंचित है। सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के तहत जमानत के सख्त मानक का पालन करते हुए आरोपियों के बीच चयनात्मक भेदभाव को वैध ठहराया और यह रुख अपनाया कि 'हर आरोपी एक ही स्तर पर नहीं है'। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि मामले में लंबी देरी स्वयं जमानत का आधार नहीं बन सकती, चाहे वर्षों में ट्रायल में कोई महत्वपूर्ण प्रगति न हुई हो।

मीडिया को जारी एक प्रेस रिलीज में कहा गया है कि एपीसीआर के निकट यह तरीका पहले सुनवाई पर निरोध को अनिश्चित काल तक सामान्य बनाने के समान है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निर्दोषता के सिद्धांत और भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। संगठन इस बात पर जोर देता है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, लेकिन यूएपीए के तहत इस सिद्धांत को लगातार उल्लंघित किया जा रहा है।

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि उमर खालिद और शरजील इमाम चार साल से अधिक समय से किसी सजा के बिना जेल में रहे हैं। बिना पूरे ट्रायल के जमानत से इनकार वास्तव में अपराध सिद्ध होने से पहले सजा देने के समान है और असहमति को अपराध बनाने का एक खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

इस लंबी जेल पर हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता व्यक्त की गई है। 2 जनवरी 2025 को अमेरिका के कई विधायकों ने भारतीय राजदूत को पत्र लिखकर उमर खालिद की रिहाई और न्यायसंगत ट्रायल की मांग की, जबकि 3 जनवरी 2025 को न्यूयॉर्क सिटी के नवनिर्वाचित मेयर ज़हरान ममदानी ने सार्वजनिक रूप से उमर खालिद से एकजुटता व्यक्त करते हुए उनकी रिहाई की मांग की। यह प्रतिक्रिया भारत में यूएपीए के उपयोग पर बढ़ती वैश्विक निगरानी को दर्शाती है।

एपीसीआर का कहना है कि यूएपीए के तहत लंबी जेल अब एक सावधानी भरा कदम नहीं बल्कि सजा के विकल्प के रूप में उपयोग की जा रही है। हालांकि संगठन पांच आरोपियों को दी गई जमानत का स्वागत करता है, लेकिन वह इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करता है कि लगाई गई बारह सख्त शर्तें निगरानी, परेशानी या आवाज दबाने के साधन न बनें। सशर्त स्वतंत्रता ऐसी नहीं होनी चाहिए जो वास्तव में स्वतंत्रता का इनकार बन जाए।

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