आरएसएस का युवाओं और महिलाओं पर ध्यान बढ़ाने का फैसला


साठ साल पहले जब भारत ब्रिटेन के अधीन था, उस समय देश के विचारधारा और राजनीतिक परिदृश्य में दो पूरी तरह से विपरीत विचारधाराओं ने जन्म लिया। इन विचारधाराओं ने वर्षों लोगों के विचारों को प्रभावित करने की भरपूर कोशिश की, लेकिन चूंकि इन दोनों की विचारधारा की बुनियाद जरूरत और भावनाओं पर आधारित थी, इसलिए जब भावनाओं के तूफान का जोर बढ़ा, तो आम जीवन की जरूरतों, मेहनत और रोजगार के पहलुओं पर उठने वाला शोर महज शोर ही रह गया और भावनाओं पर आधारित झुकाव ने राजनीति से लेकर जीवन के हर क्षेत्र पर अपना शिकंजा इतना मजबूत कर लिया कि इसकी पकड़ से निकलना शायद असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) और अन्य पार्टियां वे पार्टियां रही हैं जिनकी शुरुआत इन्हीं दो विपरीत विचारधाराओं पर अपनी बुनियाद रखने में सफल हुई हैं।
बीसवीं सदी की दूसरी दशक में भारत की आजादी की लड़ाई कांग्रेस और महात्मा गांधी की अगुआई में तेज हो गई थी। इसी दौरान 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति हुई, जिसने पूरी दुनिया में राजनीतिक सोच को हिला दिया। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मजदूरों और किसानों के शासन का विचार भारत तक भी पहुंचा। विदेश में रहने वाले कुछ भारतीय और खिलाफत आंदोलन से जुड़े लोग रूस गए, जहां उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर एक नई राजनीतिक दिशा खोजने की कोशिश की। 1920 में विदेश में कम्युनिस्ट पार्टी बनाने की एक प्रारंभिक कोशिश जरूर हुई, लेकिन यह एक छोटा सा समूह था इसलिए यह प्रयास ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका। लेकिन विचार जीवित रहा।
आखिरकार 1925 वह साल साबित हुआ जिसने भारतीय राजनीति के इतिहास को बदल दिया। 27 सितंबर 1925 को आरएसएस की स्थापना हुई और उसी साल 26 दिसंबर को कानपुर में एक ऐतिहासिक सम्मेलन के माध्यम से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया अस्तित्व में आई। 26 से 28 दिसंबर तक चले इस सम्मेलन में लगभग 500 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यहां एक ऐसी पार्टी की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य स्पष्ट और क्रांतिकारी था, "ब्रिटिश साम्राज्य सरकार से भारत की आजादी, उत्पादन और वितरण के साधनों का समाजीकरण और इसी आधार पर मजदूरों और किसानों की लोकतांत्रिक गणराज्य का निर्माण"।
इस क्रांतिकारी परंपरा में मौलाना हसरत मोहानी का नाम प्रमुख है। हसरत मोहानी न केवल एक महान कवि और साहित्यकार थे, बल्कि व्यावहारिक राजनीति में भी अद्वितीय साहस और सिद्धांतवाद का उदाहरण थे। वे उन पहले नेताओं में शामिल थे जिन्होंने 1921 में सबसे पहले 'क्रांति जिंदाबाद' का नारा लगाया और कांग्रेस के मंच से पूर्ण आजादी (पूर्ण स्वराज) की मांग की। हसरत मोहानी का झुकाव सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर था और वे मजदूरों, किसानों और वंचित वर्गों के हित में स्पष्ट रुख रखते थे। उन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन की नैतिक और बौद्धिक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हसरत मोहानी के अलावा एमएन रॉय, एसए डांगे, मुजफ्फर अहमद, पीसी जोशी और अन्य क्रांतिकारी नेताओं ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को विचारधारात्मक और संगठनात्मक आधार प्रदान किए। इन नेताओं ने मजदूर आंदोलन, किसान सभा और ट्रेड यूनियनों के माध्यम से जनता को संगठित किया। अंग्रेजी सरकार के दमन, कैद और प्रतिबंधों के बावजूद क्रांतिकारियों ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। जो लोग कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए या 1930 और 1940 के दशक में इससे जुड़े संगठनों के करीब आए, उनमें विचारधारा, सांस्कृतिक, कलात्मक और साहित्यिक दुनिया की कई प्रसिद्ध हस्तियां थीं। इन हस्तियों में गीतकार प्रेम धुन, मखदूम मोहीउद्दीन, कैफी आजमी, जान निसार अख्तर, सجاد ज़हीर, रशीद जहां, साहिर लुधियानवी, ख्वाजा अहमद अब्बास, अभिनेता बलराज साहनी, ए के हंगल, दीना पाठक और ज़ोहरा sehgal, फिल्म निर्माता रित्विक घटक, संगीतकार सलिल चौधरी, नागार्जुन, राम विलास शर्मा, अली सरदार जाफरी, अना भाऊ साठे, अमर शेख, डी एन गोंकार, मुक्ति बोध और सब्त हसन शामिल थे।
1930 और 1940 के दशक में सीपीआई को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1934 से 1942 और फिर 1945 से 1947 तक पार्टी पर प्रतिबंध लगा रहा। इन्हीं कठिन वर्षों में पीसी जोशी सीपीआई के महासचिव बने। उनकी राजनीतिक दृष्टि और संगठनात्मक क्षमता ने पार्टी को एक नई दिशा दी और जन आंदोलनों से जोड़ दिया।
1942 के बाद सीपीआई की गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी आई। आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव में पार्टी एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी और कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी बनी, जिसके 16 सदस्य संसद में चुने गए। लेकिन 1964 में विचारधारात्मक मतभेदों के कारण पार्टी दो हिस्सों में विभाजित ह







