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विपक्ष ने एसआईआर बंद करके चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की मांग की

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विपक्ष ने वोटर सूची की विशेष समग्र समीक्षा (एसआईआर) को अवैध घोषित करते हुए इसे बंद करने, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सुधार करने और चुनाव से पहले सरकारी योजनाओं के बहाने मतदाताओं में पैसे बांटने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। कांग्रेस के मनीष तिवारी ने लोकसभा में चुनावी सुधार पर सोमवार को चर्चा का आगाज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को सामूहिक और व्यापक पैमाने पर एसआईआर कराने का कानूनी अधिकार नहीं है। प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि इसके तहत किसी निर्वाचन क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों में मतदाता सूची में कोई गड़बड़ी हो तो वहां एसआईआर कराने का अधिकार चुनाव आयोग को है, लेकिन आयोग अधिकतम एक निर्वाचन क्षेत्र में एसआईआर करा सकता है, लेकिन पूरे राज्य या कई राज्यों में एक साथ एसआईआर नहीं कराया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि आज जब चुनावी सुधार पर चर्चा हो रही है तो वे बताना चाहते हैं कि सबसे बड़ा चुनावी सुधार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था। उनके नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के दौरान मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई थी। दल-बदल कानून भी चुनावी सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय था, लेकिन बाद में इसमें भी बदलाव करते हुए सामूहिक रूप से दल-बदल कराई गई।

कांग्रेस नेता ने कहा कि चुनाव आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सुधार होने चाहिए और चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक नामित मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के अलावा राज्यसभा में विपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे संतुलन बना रहेगा और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति न्यायपूर्ण और पारदर्शी तरीके से हो सकेगी।

श्री तिवारी ने एक देश, एक चुनाव प्रणाली के संदर्भ में भी सवाल उठाते हुए कहा कि संविधान सभा इस प्रणाली के पक्ष में नहीं थी। संविधान निर्माताओं ने इस प्रणाली पर विचार करते हुए इसे तर्कसंगत और न्यायपूर्ण नहीं पाया था। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली अस्वीकार कर दी गई थी।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र विश्वास पर चलती है, मतदाताओं को यह विश्वास होना चाहिए कि उनका वोट उसी को जा रहा है जिसे उन्होंने वोट दिया है। अफसोस की बात यह है कि आज मतदाताओं का इस पर विश्वास डगमगा गया है। जब विश्वास टूटता है तो अराजकता फैलती है। इसके मद्देनजर वे मांग करते हैं कि यदि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से मतदान कराया जा रहा है, तो 100 प्रतिशत वीवीपैट के प्रबंध के साथ चुनाव कराए जाएं और परिणाम उनकी गणना के बाद ही घोषित किए जाएं, या मतपत्र के माध्यम से चुनाव की ओर वापस जाएं। जापान, जर्मनी और कई अन्य देशों ने ईवीएम प्रणाली से मतपत्र प्रणाली अपनाई है।

श्री तिवारी ने कहा कि एक ओर चुनाव आयोग ईवीएम के माध्यम से चुनाव कराने पर जोर दे रहा है, दूसरी ओर यह डिजिटल रूप से मतदाता सूची प्रदान करने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी डिजिटलीकरण की यह क्या форма है?

श्री तिवारी ने कहा कि चुनाव से पहले मतदाताओं के खातों में सरकारी फंड के हस्तांतरण पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, क्योंकि यदि यह प्रक्रिया जारी रही तो कोई राज्य सरकार कभी नहीं बदलेगी। चुनाव से पहले सरकारी खजाने को खाली करते हुए मतदाताओं के खातों में 20, 25 या 30 हजार रुपये डाल दिए जाएंगे और बहुमत हासिल कर लिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि चुनाव जीतना, सरकार बनाना ही राजनीतिक दलों का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली को बचाते हुए एक अच्छा देश आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ना चाहिए।

उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव होना चाहिए, एसआईआर पर प्रतिबंध लगना चाहिए और चुनाव से पहले सरकारी फंड को मतदाताओं के खातों में डालने पर सख्त प्रतिबंध लगाने का प्रबंध होना चाहिए।

समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने चुनावी सुधार पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि जिस चुनाव आयोग से निष्पक्षता की उम्मीद थी, वह कहीं दिखाई नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि जब उत्तर प्रदेश के रामपुर में उपचुनाव हो रहे थे, तो हमें चुनाव में धांधली का शक था। मतदान के दिन पुलिस और प्रशासन इस काम में व्यस्त थी कि मतदाता घर से बाहर न निकलें। पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा के उपचुनाव रामपुर से जीते। हर घटना की सूचना चुनाव आयोग को दी गई, इसके बावजूद आयोग ने किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इससे हम समझ गए कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।

उन्होंने कहा कि जहां भारतीय जनता पार्टी ने सांप्रदायिक माहौल बनाया, वहां समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। जिस स

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