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राजनीति

स्पीकर की ईमानदारी पर सवाल उठाना अत्यधिक निंदनीय है: अमित शाह

Awaze Bihar4 मिनट पढ़ें

गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को कहा कि लोकसभा अध्यक्ष के फैसले से असहमति जताई जा सकती है, लेकिन उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना अत्यधिक निंदनीय है। संसद को चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं और किसी को भी नियमों के खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं है।

लोकसभा में अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि यह कोई साधारण घटना नहीं है। लगभग चार दशकों के बाद लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है। संसदीय राजनीति और सदन के लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। अध्यक्ष किसी पार्टी के नहीं बल्कि पूरे सदन के होते हैं और वे सदन के सभी सदस्यों के रक्षक होते हैं।

उन्होंने कहा कि लगभग 13 घंटे तक सरकार और विपक्ष के बीच चर्चा हुई और 42 से अधिक सांसदों ने इसमें भाग लिया। सदन में अध्यक्ष का फैसला अंतिम माना जाता है, लेकिन इसके विपरीत विपक्ष ने उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया है।

शाह ने कहा कि लोकसभा देश की सबसे बड़ी पंचायत है और दुनिया भर में हमारी लोकतंत्र की प्रतिष्ठा है। जब इस पंचायत के सरبرाह की प्रतिष्ठा पर सवाल उठता है, तो हमारे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठता है। संविधान ने अध्यक्ष के पद को मध्यस्थता की भूमिका दी है, लेकिन उस पर सवाल उठाया गया है। उन्होंने कहा कि इस सदन का इतिहास बताता है कि यह परस्पर विश्वास से चलता है। सदन को चलाने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं और किसी को भी नियमों के खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं है।

गृह मंत्री ने कहा कि अध्यक्ष का फैसला अनुकूल न होने के बावजूद उनकी निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जा सकता। फैसले से असहमति जताई जा सकती है, लेकिन निष्पक्षता पर सवाल उठाना अत्यधिक निंदनीय है। उन्होंने कहा कि "हम अधिक समय तक विपक्ष में रहे, लेकिन भाजपा ने कभी भी अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया। हमने हमेशा अध्यक्ष के पद के गरिमा की रक्षा करने का काम किया है। कभी भी अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाना चाहिए, यह हमारी पार्टी का सिद्धांत है।"

उन्होंने कहा कि हर कोई अध्यक्ष की महत्ता से वाकिफ है। उनके कार्यवाही के फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय भी हस्तक्षेप नहीं करता, ताकि वे बिना किसी डर के अपना काम कर सकें। उनका कर्तव्य अनुशासन और शिष्टाचार बनाए रखना है। यदि कोई भी व्यक्ति कुछ भी बोलेगा, तो अध्यक्ष उन्हें बोलने की अनुमति कैसे दे सकते हैं? कांग्रेस के वरिष्ठ सदस्य अपने नेता को क्यों नहीं सिखाते, ताकि उन्हें नियमों के बारे में जानकारी हो सके। विपक्ष सदन के बीच में आकर कागज फाड़कर अध्यक्ष पर फेंककर उन्हें असहाय बनाना चाहता है। नियम 375 के तहत गंभीर अव्यवस्था के कारण सदन को स्थगित करना पड़ता है। सदन के अंदर विपक्ष की महिला सदस्यों का प्रधानमंत्री की सीट तक आना कितना उचित है?

गृह मंत्री ने कहा कि अध्यक्ष का फैसला अनुकूल न होने के बावजूद उनकी निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जा सकता। फैसले से असहमति जताई जा सकती है, लेकिन निष्पक्षता पर सवाल उठाना अत्यधिक निंदनीय है। उन्होंने कहा कि "हम अधिक समय तक विपक्ष में रहे, लेकिन भाजपा ने कभी भी अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया। हमने हमेशा अध्यक्ष के पद के गरिमा की रक्षा करने का काम किया है। कभी भी अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाना चाहिए, यह हमारी पार्टी का सिद्धांत है।"

उन्होंने कहा कि संविधान ने सभी को अधिकार दिए हैं, लेकिन किसी को विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाते समय इस संबंध में गंभीर नहीं था कि नोटिस कैसे दिया जाएगा। अध्यक्ष ने स्वयं नोटिस की गलतियों को सुधारने का अवसर दिया, यह उनकी बड़ाई है। विपक्षी सदस्य नियमों को मानते नहीं हैं और कहते हैं कि उन्हें बोलने नहीं दिया जाता। सदन नियमों से चलता है और जो नियमों के अनुसार नहीं बोलेगा, उसका माइक बंद किया जाना चाहिए।

शाह ने कहा कि हमने विपक्षी सदस्यों की पूरी चर्चा सुनी है, जिनमें 80 प्रतिशत चर्चा केवल सरकार की आलोचना के लिए ही है। सरकार की आलोचना करने के लिए वे लोकतंत्र के गरिमा पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद खाली रहने का मामला उठाने का कांग्रेस को कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया था। हमने कम से कम उपाध्यक्ष का पद खाली रखा, लेकिन कांग्रेस ने तो शासक दल से ही इस पद को भर दिया था।

गृह मंत्री ने कहा कि श्री बिरला ने समय-समय पर देर रात तक सदस्यों को 'शून्य काल' में अपने मामले उठाने का अवसर दिया है। उन्होंने सदन के अंदर 14 भाषाओं में बोलने का प्रबंध कराया। उनके कार्यकाल में संसद को डिजिटल बनाया गया।

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