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कोलकाता: बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने बांग्लादेश के शहर मैमनसिंह में हिंदू युवक दीपो चंद्र दास की बर्बर हत्या की निंदा करते हुए धर्म अपमान कानूनों को समाप्त करने की अपनी मांग दोहराई है। उन्होंने कहा कि धर्म अपमान के नाम पर हिंसा को न्यायसंगत बनाने के लिए इन कानूनों का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है, और अब समय आ गया है कि समाज इसे अपराध घोषित करे।
तस्लीमा नसरीन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि कई लोगों को भीड़ ने धर्म अपमान के आरोप में मारा पीटा या जिंदा जला दिया है। अब यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार करनी चाहिए कि धर्म अपमान अपराध नहीं है और इसके नाम पर हिंसा करने वाले असली अपराधी हैं और उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए।
भीड़ हिंसा की बार-बार होने वाली घटनाओं का उल्लेख करते हुए तस्लीमा नसरीन ने कहा कि महज आरोपों के आधार पर लोगों को मारा जा रहा है। उन्होंने धार्मिक उन्माद के बढ़ते खतरे, धर्म अपमान की धाराओं के दुरुपयोग और बांग्लादेश में सेक्युलर आवाजों और अल्पसंख्यकों को होने वाले गंभीर खतरे पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि किसी सभ्य देश में धर्म अपमान अपराध नहीं हो सकता। इस तरह की हिंसा को समाप्त करने के लिए ऐसे कानूनों की आवश्यकता है जो भीड़ को उकसाने का साधन बनने के बजाय निर्दोष लोगों को मारने वालों को सजा दें।
तस्लीमा नसरीन ने दीपो चंद्र दास की हत्या को एक साजिश बताते हुए कहा कि एक साथी की ओर से एक छोटे से झगड़े के बाद लगाया गया झूठा आरोप हिंसा में बदल गया। उन्होंने पूछा कि भीड़ दीपो को पकड़ने में कैसे सफल रही जब वह पुलिस की सुरक्षा में था। उन्होंने इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए, जिसमें निष्क्रियता या मिलीभगत का संदेह है।
उन्होंने कहा कि दीपो पूरी तरह से निर्दोष था और एक ही आरोप ने हिंसा का उन्माद पैदा किया। तस्लीमा ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति को अत्यधिक असुरक्षित बताते हुए कहा कि गरीबों के पास कोई देश नहीं बचा, न कोई सुरक्षा और न ही कोई शरण। दीपो अपने परिवार का एकमात्र सहारा था, और उसके परिवार के पास भारत भागने का कोई साधन नहीं था।
तस्लीमा नसरीन ने फिर से आरोप लगाया कि विभिन्न सरकारें धर्म का राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग कर रही हैं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा करने वालों को सजा देने में लगातार विफल रही हैं।







