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वक्स बिहार रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन बिल विपक्ष के तीव्र विरोध के बीच लोकसभा में पेश किया गया

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विकास भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन - ग्रामीण (विकास भारत जी राम जी) विधेयक, 2025 मंगलवार को लोकसभा में पेश किया गया। विपक्ष के सदस्यों ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की जगह इस विधेयक को लाने का विरोध करते हुए कहा कि सरकार इस अधिनियम के नाम से महात्मा गांधी का नाम हटाना चाहती है, इसलिए यह विधेयक लाया जा रहा है। उनका कहना था कि मनरेगा में गरीब ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा है, सरकार इसके सिद्धांतों को बदलकर उन्हें इससे वंचित कर रही है।

ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि महात्मा गांधी हमारे दिलों में बसते हैं, हम केवल महात्मा गांधी को मानते ही नहीं, सरकार उनके विचारों पर आधारित कई कल्याणकारी योजनाओं को लागू कर रही है। हमारी सरकार ने पहले से कहीं अधिक मनरेगा के तहत गरीबों पर खर्च किया है। अब 100 दिनों की जगह 125 दिनों की गारंटी दी जाएगी। हमारा संकल्प गरीबों के कल्याण के लिए है, इसमें इसी संकल्प को पूरा करने का काम किया जाएगा। इसके लिए एक विकसित गांव का लक्ष्य है, जो गरीबों के कल्याण के लिए है। इस विधेयक से गांव का सम्पूर्ण विकास होगा। महात्मा गांधी स्वयं राम राज्य चाहते थे। यह समझ से परे है कि विपक्ष राम राज्य पर ही भड़क गया।

इस दौरान विपक्ष के सदस्य सदन के बीच में आ गए और विधेयक के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। लोकसभा अध्यक्ष ने जोरदार हंगामे के बीच विधेयक पेश किया।

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इस विधेयक पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि पिछले 20 वर्षों से मनरेगा के तहत ग्रामीण रोजगार मुहैया कराया जा रहा है। यह गरीब से गरीब लोगों को 100 दिनों का रोजगार प्रदान करता है। गरीब से गरीब लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार मिलता है। इसके तहत गरीब भाइयों और बहनों को रोजगार की गारंटी मांग के आधार पर तय होती थी। इसके लिए केंद्र से फंड भी मांग पर आधारित होता था। अब इस विधेयक में केंद्र में अनुमति दी गई है कि कितना पूंजी कहां भेजा जाए, जो कि असंवैधानिक है।

डीएमके के टीआर बालू ने इसके गठन का विरोध किया क्योंकि महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्र की आत्मा गांव में बसती है। मनमोहन सिंह सरकार ने मनरेगा योजना शुरू की जिससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिला। चूंकि इसका नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया था, इसलिए सरकार इसे नापसंद करती है और इसका नाम बदलना चाहती है।

तृणमूल कांग्रेस के सुगाता रॉय ने विधेयक की प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर आधारित योजना को बदलना उचित नहीं है। विधेयक को मांग की जगह आपूर्ति पर आधारित बनाया गया है। विस्तृत चर्चा के लिए इसे चयन समिति के पास भेजा जाना चाहिए।

आरएसपी नेता एनके प्रेमचंद्रन ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि सरकार को बताना चाहिए कि वह राष्ट्रपिता का नाम क्यों हटा रही है। यह योजना एक केंद्र प्रायोजित योजना थी जो कि मांग पर आधारित थी, लेकिन अब इसे आपूर्ति पर आधारित योजना में बदल दिया गया है। इससे राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। यह धारा विधेयक का मजाक उड़ा रही है। इस विधेयक से रोजगार को नुकसान होगा।

कांग्रेस के शशि थरूर ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि इससे हम कल्याणकारी उद्देश्य हासिल नहीं कर पाएंगे। राष्ट्रपिता का नाम हटाना उचित नहीं है। मनरेगा कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक सामाजिक कार्यक्रम था जिसका उद्देश्य गरीबों का विकास था। इससे वित्तपोषण का 40 प्रतिशत भार राज्य सरकारों पर स्थानांतरित हो जाएगा, जिससे गरीब राज्यों के लिए कठिनाइयां पैदा होंगी।

संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि जो विधेयक राष्ट्रीय हित में पारित करना है वह करेंगे। कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल ने कहा कि यह असंवैधानिक है। मनरेगा गरीबों को रोजगार की गारंटी देता है, लेकिन अब यह केवल कागजों पर रोजगार गारंटी रह जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि महात्मा गांधी का नाम हटाने वाले मंत्री को याद रखा जाएगा।

समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने विरोध करते हुए कहा कि केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारियों में लगातार कमी कर रही है और राज्यों पर बोझ बढ़ा रही है। इस देश का कोई भी नागरिक महात्मा गांधी की बेअदबी बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह विधेयक महात्मा गांधी की बेअदबी है।

एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने कहा, "हम नीति में बदलाव के खिलाफ नहीं हैं। इसे एक संयुक्त समिति के पास भेजा जाना चाहिए। इससे महात्मा गांधी का नाम नहीं हटाना चाहिए।"

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