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राजनीति

बिना चुनावी मुकाबले के 68 सीटें महागठबंधन के कब्जे में

Awaze Bihar4 मिनट पढ़ें

मुंबई, 3 जनवरी (यूएनआई) महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग ने राज्य की 29 नगरपालिका निगमों में बिना मुकाबले चुने गए 69 उम्मीदवारों के मामले की विस्तृत जांच का आदेश दिया है। यह कार्रवाई 3 जनवरी 2026 को नामांकन पत्र वापसी के बाद सामने आए व्यापक स्तर पर शिकायतों के मद्देनजर की गई है। आयोग ने एक असाधारण कदम के तहत यह भी निर्देश दिया है कि जांच पूरी होने तक इन बिना मुकाबले उम्मीदवारों को औपचारिक रूप से विजयी घोषित नहीं किया जाए, जिसके परिणामस्वरूप उम्मीदवार चुने गए माने जा रहे हैं लेकिन उनकी जीत की औपचारिक पुष्टि स्थगित रहेगी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिना मुकाबले जीती गई 69 सीटों में से 68 सीटें सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के हिस्से में आई हैं, जिनमें भारतीय जनता पार्टी ने 44, शिवसेना ने 22 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 2 सीटें हासिल की हैं, जबकि एक निर्दलीय उम्मीदवार भी बिना मुकाबले चुना गया है। राज्य निर्वाचन आयोग का हस्तक्षेप कांग्रेस, जनता दल (एस) और आम आदमी पार्टी सहित विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद सामने आया है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के उम्मीदवारों ने संगठित तरीके से दबाव, धमकी और आर्थिक प्रलोभन के माध्यम से विपक्षी उम्मीदवारों को 2 जनवरी की अंतिम तिथि से पहले अपने नामांकन पत्र वापस लेने पर मजबूर किया।

महाराष्ट्र में 29 नगरपालिका निगमों के चुनाव, जिनमें बृहन्मुंबई नगरपालिका भी शामिल है, 15 जनवरी 2026 को होने वाले हैं जबकि मतगणना 16 जनवरी 2026 को होगी। बिना मुकाबले की जीत कुछ विशिष्ट नगरपालिका निगमों में केंद्रित दिखाई दे रही है, जिनमें कल्याण-डोम्बिवली नगरपालिका निगम सबसे प्रमुख है जहां 122 सीटों में से 22 सीटें बिना मुकाबले जीती गईं, जो कुल सीटों का लगभग 18 प्रतिशत बनती हैं। इसके बाद जलगांव में 12, ठाणे में 7 जबकि पनवेल, भिवंडी, धुले, पुणे, पिंपरी-चिंचवड और अहमदनगर में 2 से 6 के बीच सीटें बिना मुकाबले रहीं।

आयोग सूत्रों के अनुसार, मौजूदा चुनावी नियमों के तहत यह जांच आवश्यक है ताकि यह पुष्टि की जा सके कि नामांकन दबाव, आर्थिक प्रलोभन या किसी अन्य जबरदस्ती के तहत वापस नहीं लिए गए। इस सिलसिले में, रिटर्निंग अधिकारी, नगर आयुक्त, पुलिस आयुक्त और जिला कलेक्टरों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई हैं। हालांकि, मौजूदा चुनावी कानूनों के कारण एक बड़ी व्यावहारिक बाधा भी सामने आई है क्योंकि 2 जनवरी की अंतिम तिथि के बाद न तो नई नामांकन भरे जा सकते हैं और न ही बिना मुकाबले चुने गए उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। ऐसे मामले में, आयोग केवल जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।

मुंबई के कुलाबा क्षेत्र से संबंधित आरोपों को सबसे गंभीर माना जा रहा है, जहां विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के विधायक राहुल नार्वेकर पर कई चुनावी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार मार्गरेट डी कोस्टा ने आरोप लगाया कि 30 दिसंबर को वह शाम 5 बजे की निर्धारित अवधि से पहले रिटर्निंग अधिकारी के कार्यालय में मौजूद थीं और सभी कार्यवाही पूरी कर चुकी थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अंतिम रूप से नामांकन भरने से रोक दिया गया। पार्टी ने दावा किया कि कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज से इसकी पुष्टि की जा सकती है।

पूर्व सांसद और पूर्व विधायक हरिभाऊ राठौड़ ने भी एक लिखित शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें दावा किया गया है कि राहुल नार्वेकर ने उन्हें धमकाया और उनकी सुरक्षा वापस लेने के लिए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया, हालांकि उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था। उसी दिन नार्वेकर के परिवार के तीन सदस्यों ने विभिन्न वार्डों से बिना मुकाबले जीत हासिल की।

राज्य निर्वाचन आयोग ने मुंबई नगर आयुक्त भूषण गर्गनी को निर्देश दिया है कि वे संबंधित रिटर्निंग अधिकारी के कार्यालय के सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा करें और हस्तक्षेप से संबंधित आरोपों पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने कहा कि किसी विधानसभा अध्यक्ष का स्वयं अपने परिवार के सदस्यों के साथ नामांकन भरने जाना एक असाधारण घटना है, जो चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठाती है। सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने राहुल नार्वेकर से संवैधानिक पद के दुरुपयोग पर माफी की मांग की।

राहुल नार्वेकर ने सभी आरोपों को बिना आधार का बताते हुए कहा कि निर्धारित समय से पहले कार्यालय में मौजूद हर उम्मीदवार को नामांकन भरने का अवसर दिया गया था और आरोप लगाने वाले उम्मीदवार निर्धारित समय के बाद पहुंचे थे। राज्य

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