मोदी और बादल की मुलाकात से पंजाब में भाजपा-अकाली दल के गठबंधन की अटकलें तेज़
Awaz E Bihar••34 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के बीच शुक्रवार को संसद भवन परिसर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसके बाद यह कयास तेज हो गए हैं कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अकाली दल का पुराना गठबंधन फिर से शुरू हो सकता है। कृषि कानूनों के विवाद के कारण छह साल पहले दोनों दल एक दूसरे से अलग हो गए थे। हालांकि इस बैठक के संबंध में किसी भी पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन पंजाब की बदलती राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इस बैठक को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सुखबीर सिंह बादल ने प्रधानमंत्री के सामने पंजाब के कई गंभीर मुद्दे उठाए। इनमें राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था की स्थिति, बार-बार होने वाले पेपर लीक, बढ़ता नशा और सरकारी योजनाओं में कथित भ्रष्टाचार जैसे विषय शामिल थे। बैठक के दौरान दोनों दलों के बीच संबंधों को फिर से जोड़ने और भविष्य में साथ मिलकर काम करने की संभावनाओं पर भी खुलकर चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों दलों के नेता अब पुराने गिले शिकवे भुलाकर एक बार फिर साथ आने का मन बना रहे हैं। भाजपा और अकाली दल लगभग 25 साल तक सबसे पुराने राजनीतिक सहयोगी रहे हैं। उन्होंने 1997 से 2017 के बीच तीन अलग-अलग कार्यकालों में पंजाब में मिलकर सरकार चलाई थी। उस समय अकाली दल गठबंधन में प्रमुख दल था और भाजपा सहयोगी दल था। सितंबर 2020 में केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का साथ छोड़ दिया था। हालांकि सरकार ने बाद में 2021 में इन कानूनों को वापस भी ले लिया था, फिर भी दोनों दलों के बीच दूरियां बरकरार रहीं। अलग होने के बाद दोनों ही दलों को चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ा। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) ने शानदार जीत दर्ज की, जबकि भाजपा और अकाली दल दोनों का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। यह खराब प्रदर्शन 2024 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा। इन लगातार चुनावी झटकों के बाद अब दोनों दलों को शायद यह महसूस होने लगा है कि अकेले लड़ने के बजाय फिर से हाथ मिलाना उनके राजनीतिक हित में होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस संभावित गठबंधन से दोनों को फायदा हो सकता है। भाजपा के पास शहरों में मजबूत संगठन है, जबकि अकाली दल के पास गांवों और परंपरागत सिख मतदाताओं का बड़ा आधार है। हालांकि, अगर इस बार यह गठबंधन फिर से बनता है, तो इसके नियम और शर्तें पहले जैसे नहीं होंगे। सूत्रों का कहना है कि इस बार भाजपा बराबरी के स्तर पर गठबंधन चाहती है, जिससे सीटों के बंटवारे और नेतृत्व के मामले में बातचीत काफी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इस बैठक के बाद 'आप' की प्रतिक्रिया भी तुरंत सामने आ गई। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि क्या भाजपा और अकाली दल एक बार फिर साथ आ रहे हैं, जिससे इस बैठक के राजनीतिक प्रभाव का अनुमान लगाया जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह गठबंधन औपचारिक रूप से बनता है, तो यह 2027 के चुनाव में पंजाब के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बदल देगा। हालांकि, दोनों दलों के लिए कृषि कानूनों के समय पैदा हुए अविश्वास को खत्म करना और सीटों का सही तालमेल बैठाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।