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उर्दू और उसके लेखकों ने अन्य भाषाओं और संस्कृतियों को भी प्रभावित किया : इम्तियाज हसनैन

Awaze Bihar4 मिनट पढ़ें

राष्ट्रीय परिषद् प्रवर्तित विश्व उर्दू सम्मेलन में आज तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रोफेसर इम्तियाज हसन ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जुनून ने ही उर्दू को कॉस्मोपॉलिटन भाषा बनाया। उर्दू ने अन्य भाषाओं पर अपने प्रभाव डाले और उनके लेखकों ने अन्य भाषाओं और संस्कृतियों को भी प्रभावित किया। विशेष रूप से शिबली की 'शعر-उल-अजम' और सैयद सुलेमान नदवी की रचनाओं ने गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने सत्र के सभी शोध-पत्रों पर चर्चा करते हुए खुशी व्यक्त की और अनुवाद पर जोर देते हुए इसे वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बतायी। प्रोफेसर चंद्रशेखर ने अध्यक्षीय भाषण में भाषा और साहित्य के बीच संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि लोकभाषा साहित्य से लोकप्रिय नहीं होती है। भाषा कहीं भी जाए, वह अपने रूप में जीवित रहती है। उदाहरण के लिए, एक भारतीय मजदूर किसी अन्य देश में जाए तो वह अपनी आम बोलचाल में मातृभाषा का उपयोग करता है। उर्दू भाषा के संबंध में उन्होंने कहा कि जब तक इस भाषा के बोलने वाले ख्वाह किसी धर्म के हों, मौजूद हैं तब तक यह भाषा जीवित रहेगी। सम्मानित जानकी प्रसाद शर्मा ने 'उर्दू और हिंदी: परस्पर प्रभाव और प्रभाव' पर चर्चा करते हुए कहा कि दुनिया की किसी भी भाषा का लिपि अपने आप में पूर्ण नहीं है। इस संबंध में उन्होंने भाषाओं के परस्पर संबंधों पर तर्कों के साथ चर्चा की। उर्दू और हिंदी भाषाओं के बारे में कहा कि उन्होंने एक दूसरे के शब्दों को बड़ी संख्या में अपनी भाषा का हिस्सा बनाया है। प्रोफेसर मोहम्मद कुतुबुद्दीन ने 'उर्दू भाषा और साहित्य के विस्तार और प्रसार में अनुवाद की भूमिका' विषय पर अरबी साहित्य के अनुवाद के संदर्भ में चर्चा करते हुए कहा कि इसके माध्यम से उर्दू भाषा की शैली और वाक्य रचना को बहुत मजबूती मिली। अरबी से आने वाले शब्द और मुहावरे उर्दू में बहुत लोकप्रिय हुए हैं। प्रोफेसर रिजवान अहमद ने 'कतर की क्षेत्रीय भाषाओं पर उर्दू के प्रभाव की स्थिति' पर महत्वपूर्ण चर्चा करते हुए कहा कि भारत और अरब देशों में संस्कृति और सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त शब्दों के उपयोग के संबंध में उपयोगी बातें बताईं। के.पी. शम्सुद्दीन ने केरल में उर्दू भाषा और साहित्य विषय पर एक प्रभावशाली शोध-पत्र प्रस्तुत किया। फिरोज अहमद ने 'लद्दाख की क्षेत्रीय भाषाओं पर उर्दू भाषा और साहित्य के प्रभाव' विषय पर एक शोध-पत्र प्रस्तुत किया। दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर मुजफ्फर अली शाह मीरी ने की। प्रोफेसर मुजफ्फर अली शाह मीरी ने अध्यक्षीय भाषण प्रस्तुत करते हुए सभी शोधकर्ताओं के शोध-पत्रों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने उर्दू संस्कृति के संदर्भ में कहा कि वर्तमान समय में संस्कृति वास्तव में प्रौद्योगिकी और मशीनों के माध्यम से समझने का नाम है। प्रोफेसर अहमद महफूज ने 'क्लासिकल उर्दू कविता पर फारसी के प्रभाव' विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि निश्चित रूप से फारसी भाषा उर्दू से बहुत अलग है, लेकिन क्लासिकल और साहित्यिक संस्कृति के संदर्भ में दोनों का संबंध बहुत निकट है। प्रोफेसर अखलाक अहमद आहान ने 'बहुभाषी भारत में फारसी और उर्दू के साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंध' विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत में फारसी के प्रभाव अन्य भाषाओं में भी बहुत देखे जा सकते हैं। प्रोफेसर विभा शर्मा ने कहा कि उर्दू अंग्रेजी की तरह एक समावेशी भाषा है। इसकी तुलना अंग्रेजी से ही की जा सकती है। डॉ. नसीम अहमद नसीम ने उर्दू और भोजपुरी के संबंधों पर महत्वपूर्ण चर्चा की। जापान से आए सम्मानित मामियाकिंसा ने उर्दू और हिंदी के संबंधों के संदर्भ में चर्चा करते हुए कहा कि मैंने जापान में उर्दू के अलावा हिंदी भाषा भी सीखी है। उन्होंने अपने शोध-पत्र में लिपि के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बिंदु प्रस्तुत किए। तीसरे सत्र के अध्यक्ष प्रोफेसर अनीसुर्रहमान ने शोधकर्ताओं के शोध-पत्रों के संबंध में चर्चा करते हुए महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि तुलनात्मक अध्ययन के मानकों को निर्धारित करना मूलभूत कार्य है। यहां यह भी समझना आवश्यक है कि तुलनात्मक अध्ययन भाषा का हो रहा है या लहजे का। मेरे अनुसार हम मानकों को भाषा के माध्यम से ही निर्धारित करते हैं। उन्होंने कहा कि अनुवाद के समय इसे सिद्धांतित करना भी बहुत आवश्यक है। पहले मेहमान-ए-आजिज फिरोज बख्त अहमद ने कहा कि कई लोग उर्दू को धर्म और संस्कृति की भाषा कहते हैं, मेरे अनुसार यह उचित नहीं है, उर्दू सभी की है। दूसरे मेहमान-ए-आजिज प्रोफेसर फारूक अंसारी ने कहा कि अनुवाद रचना से कठिन काम है और इसकी आवश्यकता है। अनुवाद

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