अयोध्या मंदिर में चोरी की जांच पर जय राम रमेश के सवाल, निगरानी करने वालों को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया?
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कांग्रेस के जनरल सचिव और संचार प्रभारी जे. राम रमेश ने अयोध्या के राम मंदिर में दानों की संदिग्ध चोरी की जांच पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि मंदिर व्यवस्था की निगरानी के जिम्मेदार लोगों को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया, जबकि संदिग्ध रूप से चोरी के 105 मामले सीसीटीवी में दर्ज हैं। श्री रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर 'दान चोरी, आस्था धोखा' शीर्षक के एक पोस्ट में आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार इस मामले में असामान्य नरमी दिखा रही है, जबकि एनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट और केंद्रीय जांच ब्यूरो जैसे केंद्रीय एजेंसियों का विपक्षी नेताओं के खिलाफ आक्रामक ढंग से इस्तेमाल किया जा रहा है। श्री रमेश ने पूछा कि मोदी सरकार अयोध्या के राम मंदिर से दान चोरी करने वालों के प्रति इतनी नरमी क्यों बरत रही है? उन्होंने दावा किया कि सीसीटीवी फुटेज से संदिग्ध चोरी के 105 मामले सामने आए हैं और सवाल किया कि जांच उन लोगों तक क्यों नहीं पहुंची, जो मंदिर व्यवस्था के जिम्मेदार होने के बावजूद संदिग्ध रूप से आरोपियों को सुरक्षा प्रदान करने के शक में हैं। श्री रमेश ने यह सवाल भी उठाया कि इन मामलों में केवल 79.85 लाख रुपये की संदिग्ध बरामदगी ही क्यों हुई। उन्होंने पूछा कि चोरी के 105 मामलों के मुकाबले में केवल 79.85 लाख रुपये बरामद होने के बाद मामले को खत्म करने की कोशिश क्यों की जा रही है? कांग्रेस नेता ने विशेष रूप से चंपत राय और अनिल मिश्रा की स्थिति पर सवाल उठाते हुए पूछा कि उन्हें आरोपी के बजाय गवाह क्यों बनाया गया है। उन्होंने पूछा कि चंपत राय और अनिल मिश्रा आरोपी क्यों नहीं हैं और वे गवाह कैसे हैं? रमेश ने चोरी का पता चलने और एफआईआर दर्ज होने के बीच संदिग्ध 21 दिन के अंतराल पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार, चोरी की गई राशि की वीडियो 4 जून को चंपत राय तक पहुंची, 5 जून को सीसीटीवी फुटेज देखी गई, जबकि एफआईआर 25 जून को दर्ज की गई। उन्होंने पूछा कि 21 दिन की इस विलंबता की पूरी सच्चाई देश के सामने क्यों नहीं रखी गई? कांग्रेस नेता ने कहा कि संदिग्ध चोरी के पैमाने से यह सवाल उठता है कि क्या ऊच्च स्तर पर मिलीभगत, लापरवाही या सुरक्षा के बिना 105 मामले जारी रह सकते थे। उन्होंने पूछा कि 105 मामलों के बावजूद केवल 8 आरोपी कैसे हो सकते हैं? उन्होंने कहा कि जांच केवल उन लोगों की पहचान तक सीमित नहीं होनी चाहिए जो संदिग्ध रूप से व्यक्तिगत चोरी में शामिल थे, बल्कि उन लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए जिनकी निगरानी में संदिग्ध रूप से ये मामले घटित होते रहे। रमेश ने सवाल किया, "क्या जांच का उद्देश्य केवल छोटे पैमाने पर दान चुराने वालों को पकड़ना था या उन लोगों की जवाबदेही भी तय करना था जिनकी देखरेख और निगरानी में यह सब संदिग्ध रूप से जारी रहा?" श्री रमेश ने दोहराया कि कांग्रेस ने शुरुआत से ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र, पक्षपात रहित और विश्वसनीय जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि दान राम के नाम पर दिए गए थे। उनका कहना था कि यदि 105 मामलों के बावजूद जांच संदिग्ध रूप से चोरी की गई कुल राशि का निर्धारण नहीं कर पाई है तो जांच को जल्दी खत्म करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या सरकार वास्तव में संदिग्ध चोरी के जिम्मेदार सभी लोगों की पहचान करना चाहती है या जांच के अधिक जवाबदेह लोगों तक पहुंचने से पहले ही मामले को खत्म करना चाहती है। श्री रमेश ने पूछा कि प्रधानमंत्री, देश के लोगों के विश्वास से जुड़े इस मामले पर आपकी चुप्पी कब टूटेगी? उन्होंने चेतावनी दी कि सत्ता का अहंकार स्वयं विनाशकारी होता है और संदिग्ध रूप से दानों की चोरी के मामले में जवाबदेही तय करने की मांग की।