साक्षी चौधरी की मेहनत रंग लाई, राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक
Awaz E Bihar••22 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
साक्षी चौधरी को वर्षों से भारतीय मुक्केबाजी का भविष्य माना जाता था। १५ वर्ष की आयु में जूनियर विश्व चैंपियन और १८ वर्ष की आयु तक लगातार दो युवा विश्व खिताब जीतने वाली भावनी की इस मुक्केबाज से उम्मीद थी कि वह सीनियर स्तर पर भी देश के लिए बड़े सम्मान जीतेंगी, लेकिन बार-बार कंधे की चोट ने उनके करियर की गति रोक दी। जब उनकी समकालीन मुक्केबाज राष्ट्रमंडल खेल, एशियाई खेल और ओलंपिक में भाग ले रही थीं, साक्षी चोट के कारण एक के बाद एक मौका गंवाती रहीं। फिर २०२६ के राष्ट्रमंडल खेलों के चयन से पहले उन्हें एक और बड़े चुनौती का सामना करना पड़ा। ५४ किलोग्राम वर्ग में एशियाई चैंपियन प्रीति पवार के मजबूत दावे के कारण साक्षी ने कोचों की सलाह पर ५१ किलोग्राम वर्ग में उतरने का फैसला किया। वजन बदलना केवल कुछ किलो कम करने का नाम नहीं है, बल्कि गति, शक्ति और सहनशीलता को बनाए रखना भी आवश्यक है। साक्षी ने यह कठिन चरण सफलतापूर्वक पार किया, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए उन्हें दो विश्व चैंपियन, निकहत ज़रीन और मीनाक्षी हुड्डा को हराना था। साक्षी ने पहले निकहत और फिर ट्रायल्स में मीनाक्षी को हराकर साबित कर दिया कि वह केवल पूर्व युवा चैंपियन नहीं बल्कि विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार हैं। टिप्पणीकारों के अनुसार, ये जीत ग्लास्गो में होने वाले प्रत्येक प्रतियोगिता से अधिक कठिन थीं। राष्ट्रमंडल खेलों में साक्षी ने असाधारण आत्मविश्वास का प्रदर्शन करते हुए अपने चारों मुकाबले सर्वसम्मत निर्णय से जीते। दक्षिण अफ़्रीका की लेथाबो मोडुकानाले, उत्तरी आयरलैंड की कैटलिन फ्रायर्स, कनाडा की एम्बर जीन वाल और फ़ाइनल में इंग्लैंड की रूबी व्हाइट उनके सामने बेबस दिखीं। फ़ाइनल में भी साक्षी ने अपनी लंबी पहुंच, सटीक पंच और उत्कृष्ट रणनीति के कारण रूबी व्हाइट को संभलने का मौका नहीं दिया और सर्वसम्मत निर्णय से अपने पहले ही राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत लिया। साक्षी की यह जीत केवल ग्लास्गो में चार जीत का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों की मेहनत, चोटों से वापसी, वजन का वर्ग बदलने और विश्व चैंपियन प्रतिद्वंद्वियों को हराने की जद्दोजहद का फल है। भारतीय महिला मुक्केबाजी के लिए भी यह जीत इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा इतनी कठिन हो गई है कि राष्ट्रमंडल खेलों की टीम में जगह बनाने के लिए पहले विश्व चैंपियन मुक्केबाजों को हराना पड़ता है। अब साक्षी की नज़रें एशियाई खेलों, विश्व चैंपियनशिप और २०२८ ओलंपिक पर हैं, जहां वह एक पूर्व जूनियर स्टार नहीं बल्कि राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियन के रूप में उतरेंगी।