
नफ़रत भरे भाषणों के विरुद्ध व्यापक दिशानिर्देशों की मांगों पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में घृणास्पद भाषण की घटनाओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने के निर्देश देने के अनुरोधों पर मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अनुरोधों की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर संक्षिप्त लिखित प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
इन अनुरोधों पर सुनवाई अदालत के पिछले निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में की जा रही है, जिसमें यह आदेश दिया गया था कि जब भी कोई भाषण या व्यवहार भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 153बी, 295ए और 505 के तहत अपराध माना जाता है, तो अधिकारियों को मामला दर्ज करने और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतः कार्रवाई करनी चाहिए, और उन्हें इसके लिए औपचारिक शिकायत का इंतजार नहीं करना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल, एमआर शमशाद, संजय पारिख, संजय हेगड़े और अधिवक्ता निजाम पाशा ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए, जबकि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू और वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व किया। कई याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश होने वाले अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा घृणास्पद भाषण की घटनाओं पर, विशेष रूप से जब आरोपियों का संबंध शासक दलों से होता है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने में लगातार हिचकिचाहट दिखाई देती है।
उन्होंने तर्क दिया कि समस्या कानूनी प्रावधानों की अनुपस्थिति की नहीं है, बल्कि उनके असंपूर्ण कार्यान्वयन की है। अदालत के बार-बार निर्देशों के बावजूद "संदिग्ध व्यक्ति" उत्तेजक भाषण जारी रखते हैं, एफआईआर के बाद अक्सर गिरफ्तारियां नहीं की जाती हैं, और अधिकारी कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, यहां तक कि ऐसी घटनाओं का पहले से प्रचार किया जाता है जिसमें घृणास्पद भाषण के स्पष्ट संकेत का विज्ञापन दिया जाता है, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है।
याचिकाकर्ताओं ने डिजिटल युग में घृणास्पद भाषण की बढ़ती प्रकृति को भी उजागर किया। वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने एक याचिका का हवाला दिया जिसमें एक वीडियो में कथित तौर पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सांप्रदायिक कथा का उपयोग किया गया था। उन्होंने घृणास्पद भाषण के ऐसे मामले में एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने पर भी चिंता व्यक्त की, जिनमें सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती है। जबकि यह अनुमति केवल धारणा के चरण पर आवश्यक होती है, एफआईआर दर्ज करने या जांच शुरू करने के लिए नहीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे घृणास्पद भाषण अब एक जीवन चक्र का अनुसरण करता है, जो एक नारे या वाक्य से शुरू होता है, सोशल मीडिया के माध्यम से फैलता है, और अंततः मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो जाता है। उन्होंने "यूपीएससी जिहाद" के प्रसारण जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए अदालत से अपील की कि वह बड़े निगमों और डिजिटल प्लेटफार्मों के लिए घृणास्पद भाषण को अलाभकारी बनाने के तरीके पर विचार करे।
वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद और अधिवक्ता अमित पाई ने भी तर्क दिया कि पुलिस अधिकारी अक्सर अनावश्यक रूप से सरकार की पूर्व अनुमति पर जोर देकर एफआईआर दर्ज करने से इनकार करते हैं। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया कि जबकि धारणा के चरण पर अनुमति की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन एफआईआर के पंजीकरण के लिए यह शर्त नहीं है।
पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से पेश होकर वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने तर्क दिया कि ताहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ के मामले में जारी किए गए दिशानिर्देशों को मजबूत बनाने और उनमें संशोधन करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि घृणास्पद भाषण की घटनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सके। एक याचिका यह भी दायर की गई कि घृणास्पद भाषण को पिछड़े वर्गों पर प्रभावित संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में "संवैधानिक उत्पीड़न" माना जाना चाहिए, जिसका समाधान आपराधिक कानूनी उपचार से परे हो सकता है।
केंद्र सरकार की ओर से जवाब देते हुए, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने बताया कि अदालत के निर्देशों का पालन किया गया है। उन्होंने कहा कि अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज की गई है, जबकि अन्य मामलों की जांच में कोई आपराधिक अपराध का खुलासा नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए स्पष्ट किया कि एक मामला काजिम अहमद शिरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य का है, जो नोएडा के एक मुस्लिम विद्वान के खिलाफ कथित तौर पर घृणास्पद भाषण से संबंधित है, जिस पर बाद के चरण में अलग से सुनवाई की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने
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