
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट्स से संबंधित एफआईआर पर हाई कोर्ट के दिशानिर्देशों को बरकरार रखा
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट से संबंधित मामले में एफआईआर दर्ज करने को विनियमित करने से संबंधित तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों को सही ठहराया है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिष्णोई की पीठ ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान तेलंगाना राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिकाओं के एक समूह को खारिज कर दिया, जिसमें हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। इस फैसले में तीन एफआईआर को रद्द करते हुए सोशल मीडिया सामग्री पर आधारित आपराधिक कार्रवाई से निपटने के लिए पुलिस और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के लिए विस्तृत संचालन दिशानिर्देश निर्धारित किए गए थे।
हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि उसने दिशानिर्देशों की बारीकी से समीक्षा की है और उन्हें बदलने का कोई कारण नहीं पाया है। पीठ ने कहा, "हमने अनुच्छेद 29 की पूरी समीक्षा की है। हमारा मानना है कि हमें हाई कोर्ट के फैसले और आदेश में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जिसमें हाई कोर्ट द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देश भी शामिल हैं।"
अपने आदेश में, तेलंगाना हाई कोर्ट ने नल्ला बालु के खिलाफ कांग्रेस पार्टी पर आलोचना से संबंधित उनके एक्स पोस्ट के संदर्भ में दर्ज तीन एफआईआर को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि पोस्ट यद्यपि आलोचनात्मक थी, लेकिन वे वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति के दायरे में आती थी। इसके अलावा, शिकायतों में विशिष्ट विवरणों की कमी थी और शिकायतकर्ताओं के पास इस मामले में हस्तक्षेप या शिकायत दर्ज करने का कानूनी अधिकार मौजूद नहीं था। अदालत ने पाया कि आपराधिक कार्रवाई जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि दुश्मनी को बढ़ावा देने, सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पहुंचाने या दंगा जैसे अपराधों में एफआईआर केवल तभी दर्ज की जा सकती है जब पहली नजर में ऐसा मामला बनता हो जिससे हिंसा, नफरत या सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने के लिए उकसाने के साक्ष्य मिलते हों।
हाई कोर्ट द्वारा जारी किए गए संचालन दिशानिर्देशों में अपमान या इस प्रकार के अपराधों में एफआईआर दर्ज करने से पहले सुनवाई के अधिकार की पुष्टि, गंभीर मामलों में कानूनी तत्वों की पुष्टि के लिए प्रारंभिक जांच और राजनीतिक भाषण से संबंधित मामलों में एक उच्च मानक का अनुप्रयोग शामिल है, जो केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य और श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार है।
दिशानिर्देशों में अर्णेश कुमार बनाम बिहार राज्य में निर्धारित गिरफ्तारी से संबंधित सुरक्षा उपायों का सख्ती से पालन, संवेदनशील मामलों में सरकारी वकील से पूर्व सलाह और भारतीय दंड संहिता की धारा 176(1) के तहत आधारहीन या राजनीतिक प्रेरणा पर आधारित शिकायतों को बंद करना अनिवार्य कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में तेलंगाना राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने एफआईआर की रद्दी को चुनौती नहीं दी, लेकिन दिशानिर्देशों के दायरे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वे एकसमान नहीं हैं और उनमें सुधार की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि वह हाई कोर्ट के फैसले या तैयार किए गए दिशानिर्देशों में हस्तक्षेप करने का इच्छुक नहीं है।
संबंधित समाचार

आरएसएस का युवाओं और महिलाओं पर ध्यान बढ़ाने का फैसला

अरुणाचल में चीन के साथ झड़प पर सरकार सच छिपा रही है, देश को पूरी जानकारी दी जाए: खरगे

