चुनाव आयोग की 14 आपत्तियों पर स्पष्टीकरण, असहमति को सामान्य बताया
Awaz E Bihar••19 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
नई दिल्ली: भारत के चुनाव आयोग ने पिछले 10 महीनों के दौरान अपने दो सदस्यों द्वारा दायर की गई 14 आपत्तियों पर रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि विभिन्न विचार, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव निकाय में नियमित निर्णय लेने का हिस्सा हैं। आयोग ने दावा किया कि सभी अंतिम निर्णय आम सहमति से लिए गए थे, लेकिन आपत्तियों में उठाए गए कई विशिष्ट प्रश्नों का सीधे तौर पर उत्तर नहीं दिया। यह स्पष्टीकरण द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच के बाद आया, जिसमें पता चला कि चुनाव आयुक्त एसएस सिंधु और विवेक जोशी ने आयोग द्वारा की गई विभिन्न कार्रवाइयों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाना या बहाल करना, चुनाव डेटा तक पहुंच और अपील सहित महत्वपूर्ण मुद्दों से संबंधित आपत्तियां शामिल हैं। आयोग ने अपने बयान में कहा कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है और अंतिम निर्णय लेने से पहले लिखित नोटिस, टिप्पणियाँ, तकनीकी सुझाव और आंतरिक निगरानी प्रणाली सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक, सदस्यों द्वारा दिए गए सुझावों का मकसद चुनावी प्रक्रिया को और बेहतर बनाना और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना था. चुनाव आयोग ने कहा कि पिछले एक साल के दौरान एसआईआर सहित मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण, लगभग 40 नई पहल और अन्य चुनाव सुधारों से संबंधित निर्णय पूर्ण आयोग की सहमति से लिए गए। आयोग का कहना है कि केवल कुछ आंतरिक नोट्स और टिप्पणियों को सामने रखकर संस्था के काम को देखना 'तस्वीर का केवल एक पक्ष' प्रस्तुत करता है। हालाँकि, रिपोर्ट में उठाए गए विशिष्ट मुद्दों का आयोग के बयान में विवरण नहीं दिया गया है। इनमें फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक अधिकारियों की पहुंच और पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के खिलाफ दायर अपीलों को मंजूरी देना शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, मई में विवेक जोशी ने फॉर्म 6 में प्रस्तावित बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि चुनाव नियमों में संशोधन किए बिना फॉर्म में ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता है. एसएस सिंधु भी इस राय से सहमत थे. बाद में अगस्त में, सिंधु ने बदलाव को "अनधिकृत और अवैध" बताया और इसे तत्काल हटाने का आह्वान किया। दोनों कमिश्नरों ने चुनावी आंकड़ों के मामले में भी चिंता जताई. सिंधु ने अगस्त में कहा था कि कुछ राज्य चुनाव अधिकारियों को ईआरओनेट तक पूरी पहुंच नहीं मिल रही है, जबकि जोशी ने चुनाव डेटाबेस और उसके ऑडिट के संभावित केंद्रीय नियंत्रण की आवश्यकता पर सवाल उठाया था। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म एक सख्त डेटा सुरक्षा और ऑडिट प्रणाली के तहत काम करते हैं और चुनाव अधिकारी अपनी कानूनी शक्तियों के अनुसार मतदाता पंजीकरण और डीलिस्टिंग करते हैं।