अमेरिकी टैरिफ बढ़ा तो निर्यात और किसानों पर पड़ेगा असर: खड़गे
Awaz E Bihar••16 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जन खड़गे ने कहा है कि भारत पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अमेरिकी धमकी से भारतीय निर्यात और किसानों के हित प्रभावित होंगे, इसलिए सरकार को उसके दबाव में आने के बजाय राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। मल्लिकार्जन खड़गे ने बुधवार को सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 100% तक बढ़ाने की अमेरिका की धमकी मोदी सरकार की विदेश और व्यापार नीति की विफलता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि दवा, कपड़ा, इंजीनियरिंग उपकरण, रसायन, ऑटो पार्ट्स, रत्न और आभूषण के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रौद्योगिकी क्षेत्र को टैरिफ में भारी वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पहले 25 फीसदी और फिर 50 फीसदी टैरिफ लगाया गया और अब 100 फीसदी टैरिफ की धमकी दी जा रही है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ऐसे व्यापार ढांचे पर सहमत हुई है, जिससे अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारत में बाजार बढ़ेगा और किसानों के हित प्रभावित होंगे. उनके मुताबिक इस ढांचे के तहत भारत पर अगले पांच साल में करीब 500 अरब डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने का दबाव रहेगा. कांग्रेस अध्यक्ष ने यूपीआई पर शून्य एमडीआर व्यवस्था खत्म करने के सरकार के फैसले को अमेरिकी दबाव से जोड़ते हुए कहा कि टैरिफ, व्यापार, एच-1बी वीजा, वीजा प्रणाली और डिजिटल भुगतान सहित विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी दबाव बढ़ रहा है। इससे पहले, कांग्रेस के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने आज लिखा कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा बुधवार को भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले विधेयक पर मतदान करने वाली है, जबकि अमेरिकी सीनेट पहले ही इसे मंजूरी दे चुकी है। ट्रंप प्रशासन ने भारतीय अप्रवासियों पर नकेल कसते हुए एच-1बी वीजा की कीमत बढ़ा दी है। संशोधित प्रणाली के तहत, बेरोजगार होने पर वीजा धारकों को तुरंत निर्वासित किया जा सकता है। जयराम रमेश ने कहा कि मोदी सरकार ने अमेरिका की मांग के आगे झुकते हुए जीरो एमडीआर सिस्टम को खत्म कर यूपीआई पर चार्ज लगाने का रास्ता खोल दिया है. उन्होंने सवाल किया कि 0.4 फीसदी एमडीआर क्यों है और क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि डेबिट कार्ड पर भी एमडीआर 0.4 फीसदी है? उन्होंने पूछा कि क्या ऐसा अमेरिकी कार्ड कंपनियों को यूपीआई के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाने के लिए किया जा रहा है। क्या इससे यूपीआई 'टिकाऊ' बन जाएगा, जैसा कि सरकार का दावा है? उन्होंने यह भी कहा कि पूरे यूपीआई इकोसिस्टम को चलाने की अनुमानित लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये सालाना है और यह राशि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा केंद्र सरकार को हस्तांतरित की गई राशि के 10 प्रतिशत से भी कम है।