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पुलिस अत्याचार के खिलाफ महत्वपूर्ण फैसला
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पुलिस अत्याचार के खिलाफ महत्वपूर्ण फैसला

Awaz E Bihar•13 जुलाई 2026 को 02:28 pm बजे•25 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

मुफ्ती मुहम्मद सना उल हुदा कासमी
उप नाजिम امारत शरई बिहार ओडिशा और झारखंड

जब किसी मुलजिम को पुलिस पकड़ती है तो अपराध कबूल कराने के लिए उत्पीड़न और बर्बरता की सारी हदें पार कर जाती है, अदालत जब किसी मुलजिम को पुलिस रिमांड में देती है तो वह उत्पीड़न के कारण "अधमरा" हो जाता है, आंतरिक अंगों पर इस उत्पीड़न के जो प्रभाव होते हैं वे तो होते ही हैं, बाहरी तौर पर भी वह चलने-फिरने के काबिल नहीं रहता, इस उत्पीड़न और बर्बरता के परिणामस्वरूप मुलजिम की जान भी चली जाए तो कोई दंड नहीं होता, न कोई सजा मिलती है, इस कारण पुलिस वाले निडर होकर बर्बरता की अति कर देते हैं और जान चली जाने पर उन्हें मुठभेड़ में मारे जाने का दावा कर देते हैं और मरने के बाद भी मुलजिम को गोलियों से छलनी करने से बाज नहीं आते।

ऐसा पहली बार हुआ है कि अप्रैल 2026 में मदुराई की विशेष सीबीआई अदालत ने नौ पुलिसकर्मियों को मुलजिम पर उत्पीड़न और उसके परिणामस्वरूप दो मुलजिमों की मौत पर मृत्युदंड सुनाया है, जज जी मुथुकुमारन ने इस मामले को अद्वितीय बताया और सजा भी वह सुनाई जो पहले किसी अदालत ने नहीं सुनाई थी।

मामला 59 वर्षीय जे राज और उनके 31 वर्षीय बेटे बैंक्स का है, वे दोनों तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के सातनकुलम में एक छोटी सी मोबाइल की दुकान चलाते थे, जून 2020 में पुलिस ने उन दोनों को कोरोना के दौरान निर्धारित समय से कुछ देर तक दुकान खुली रखने पर पकड़ लिया, जेल में तीसरे दिन बैंक्स ने आंतरिक रक्तस्राव के कारण दम तोड़ दिया, कुछ घंटों बाद ही बेटे के गम और फेफड़े फट जाने के कारण जे राज भी चल बसा।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने थाने में बर्बरता की हदें पार कर दीं, उनके पीछे के रास्ते में लाठी डाली, जे राज के सीने को भारी बूटों से कई बार कुचला, उनकी त्वचा उधेड़ दी, पैर की उंगलियां तोड़ डालीं, थाने के बाहर भीड़ के शोर मचाने और कुछ पुलिसकर्मियों के मना करने के बाद भी उत्पीड़न जारी रखा और दरोगा लोगों को धमकाता रहा, मुलजिमों की चीख कम होती तो वह और तेजी से मारने का आदेश देता।

पुलिस वाले सभी एक जैसे नहीं होते, इसलिए हेड कॉन्स्टेबल आर रविती ने सीबीआई के सामने अपना बयान दर्ज कराया, वह डरी जरूर थी, लेकिन मक्कार नहीं, इस तरह न्याय के लिए छह साल का सफर शुरू हुआ, सीबीआई जांच, एक महिला पुलिस और जज ने मिलकर इस मामले को अंजाम तक पहुंचाया और नौ पुलिसकर्मियों को इस अपराध में मृत्युदंड सुनाकर दम लिया, हालांकि उन्हें प्रभावशाली पुलिस नेटवर्क से बराबर धमकियां मिलती रहीं।

मेरा ख्याल है कि मामले की यह कार्रवाई अभी पूरी तरह से पूरी नहीं हुई है, इसलिए कि इस अपराध को छिपाने और दबाने वालों पर भी दंड होना चाहिए, उनमें सातनकुलम सरकारी अस्पताल के मेडिकल अधिकारी डॉ एन विटला भी हैं, जिनका फर्ज था घावों का रिकॉर्ड करना, लेकिन उन्होंने बीस से अधिक घाव शरीर पर मौजूद होने के बावजूद पिता और बेटे को जेल भेजने के लिए "फिट" घोषित किया, मजिस्ट्रेट डी सरवन की जिम्मेदारी थी कि वह बताते कि हिरासत में मुलजिम के साथ मारपीट तो नहीं हुई, उन्होंने पंद्रह फीट दूर से दोनों को देखा और पुलिस रिमांड में भेज दिया, कोविलपट्टी जेल के जेलरों ने बिना जांच के दोनों को रख लिया और दोनों तक उन्हें तड़प-tड़प कर मरते देखा, डॉक्टर, मजिस्ट्रेट और जेलर तीनों ही उनकी मौत के जिम्मेदार हैं, लेकिन फैसले में उन पर कोई विशेष दंड नहीं हुआ है।

सत्रह राज्यों के आठ हजार से अधिक पुलिसकर्मियों की सर्वेक्षण रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 से 2022 के बीच पुलिस हिरासत में तीन सौ से अधिक लोग मौत के मुंह में चले गए हैं, स्थिति यह भी है कि 300 से अधिक न्यायिक जांच में केवल एक तिहाई मामलों में गिरफ्तारी हुई, उसी में 80 से कम मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई और एक में भी दंड नहीं हुआ।

जरूरत इस स्थिति को बदलने की है, उत्पीड़न के खिलाफ, मानवाधिकार परिषद संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में भारत ने हस्ताक्षर किए थे, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता, मौजूदा पुलिस कानून और अपराध की जांच के मामले में संशोधनों के बावजूद उत्पीड़न और बर्बरता को पूरी तरह से रोकने का इसमें स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इसलिए "नीयत और नीति" दोनों में पारदर्शिता लाए बिना इस काम को रोका नहीं जा सकता, पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ दंड का यह रुझान चल पड़ा तो उत्पीड़न में कमी आने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
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