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आधार कार्ड के छह साल बाद भी 3.11 करोड़ नागरिकों को शहादतनामा से वंचित
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आधार कार्ड के छह साल बाद भी 3.11 करोड़ नागरिकों को शहादतनामा से वंचित

Awaz E Bihar•10 अगस्त 2026 को 06:18 pm बजे•16 व्यूज़•5 मिनट पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और असम सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए ६ और हफ्ते दिए वर्तमान राज्य सरकार राजनीतिक लाभ के लिए नागरिकता के मुद्दे को जीवित रखना चाहती है : मौलाना अरशद मदनी

असम में अंतिम एनआरसी के कार्यान्वयन और इसमें शामिल नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने के संबंध में जमीयत उलेमा हिंद और एएमएसओ द्वारा वकील ऑन रिकॉर्ड फजील अहमद अयूबी के माध्यम से दायर महत्वपूर्ण याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एसएम नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की दो सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की। हालांकि, केंद्र और असम सरकार की ओर से नोटिस जारी करने के बावजूद जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर कोर्ट ने मामले की सुनवाई छह हफ्ते के लिए स्थगित कर दी.
विज्ञप्ति के अनुसार, सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा, जिसे अदालत ने दे दिया. जमीयत उलेमा हिंद की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि नोटिस जारी होने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है और अब उन्हें अदालत के समक्ष अपनी आपत्ति और जवाब दाखिल करना होगा। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को आगे बताया कि जमीयत उलेमा हिंद की याचिका पर भारत के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जवाब दाखिल किया गया है, जिसके जवाब में जल्द ही जमीयत उलेमा हिंद की ओर से जवाब दाखिल किया जाएगा. उन्होंने अदालत का ध्यान इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर भी आकर्षित किया कि अंतिम एनआरसी के प्रकाशन के छह साल बाद भी इसमें शामिल लोगों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी नहीं किए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की आज की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि केंद्र और असम सरकार द्वारा नोटिस के बावजूद जवाब दाखिल न करना और अंतिम एनआरसी के छह साल बाद भी कानूनी प्रक्रिया पूरी न करना इस संदेह को मजबूत करता है कि नागरिकता के इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझकर जीवित रखा जा रहा है। इसका कारण यह है कि सामाजिक स्तर पर हमेशा सांप्रदायिक तनाव रहा है, चाहे वह पंचायत प्रमाणपत्र बदलने का मामला हो, नागरिकता की अंतिम तिथि हो, फिर राज्य में मदरसों को बंद करने की साजिश हो, जमीयत उलेमाए हिंद ऐसी हर स्थिति में पीड़ितों के साथ खड़ी रही है और उनके मामलों को सफलतापूर्वक लड़ती रही है।
मौलाना मदनी ने आगे कहा कि भाजपा की वर्तमान राज्य सरकार भेदभाव और नफरत की राजनीति और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर चल रही है और राजनीतिक लाभ के लिए नागरिकता के मुद्दे को जीवित रखना चाहती है, यही कारण है कि वह अंतिम एनआरसी के बाद भी लोगों को पहचान पत्र जारी करने में छह साल से जानबूझकर देरी कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि असम में एनआरसी प्रक्रिया को कानून के अनुसार पूरा करना राज्य में शांति और सद्भाव की बहाली के लिए आवश्यक है और समानता, भाईचारे और कानून के शासन जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है।
ज्ञात हो कि जमीयत उलमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी के मार्गदर्शन और संरक्षण में मौलाना मुश्ताक अनफ़र 14 वर्षों से एनआरसी और पंचायत सर्टिफिकेट 6ए जैसे महत्वपूर्ण मामले लड़ रहे हैं और सफल रहे क्योंकि असम का मुद्दा एक संवेदनशील मुद्दा था। एएमएसओसी के अध्यक्ष उद्दीन और अन्य अधिकारी उपस्थित थे। बता दें कि इस मामले से असम के पूर्व एनआरसी समन्वयक हितेश देव शर्मा की याचिका भी जुड़ी हुई है, जिसमें एनआरसी सूची की खामियों और त्रुटियों को दूर करने के लिए उसके दोबारा सत्यापन की मांग की गई है.
विशेष रूप से, असम एनआरसी को सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में 2013 से 2019 तक पूरा किया गया था। भारत के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य समन्वयक द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित अंतिम एनआरसी वर्षों की सावधानीपूर्वक डेटा तुलना के आधार पर 3.3 करोड़ आवेदनों की जांच का परिणाम है। इसका उद्देश्य असम में दशकों पुराने नागरिकता मुद्दे का कानूनी और अंतिम समाधान प्रदान करना था। हालाँकि, अंतिम एनआरसी के प्रकाशन के छह साल से अधिक समय बाद, अधिकारी अब तक कानून द्वारा अनिवार्य कदम उठाने में विफल रहे हैं, यानी 31 मिलियन योग्य नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने में, जैसा कि नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना) नियम, 2003 के नियम 13 के तहत आवश्यक है और व्यक्तियों को वंचित कर दिया गया है। (लगभग 19 लाख) अस्वीकृति पर्चियां जारी करने और अपील शुरू करने के लिए, जैसा कि नियम 4ए की अनुसूची के पैरा 8 में बताया गया है।
याचिका में कहा गया है कि अधिकारियों की यह विफलता एनआरसी की पूरी प्रक्रिया को अपूर्ण, असंवैधानिक, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बनाती है। प्रकाशन के बाद अंतिम एनआरसी को स्थगित रखना एक बड़ी आबादी को अनिश्चित नागरिकता की स्थिति में छोड़ रहा है, जिससे भय, अविश्वास और सामाजिक विभाजन बढ़ रहा है। याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि असम एनआरसी एक वैज्ञानिक, डेटा-संचालित और साक्ष्य-आधारित प्रक्रिया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में किया गया है। सार्वजनिक विश्वास, अदालत का समय और 1,600 करोड़ रुपये से अधिक राष्ट्रीय संसाधन खर्च करने के बाद, यह जरूरी है कि प्रक्रिया नागरिकता अधिनियम, 1955 और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार पूरी की जाए। याचिका में अनुरोध किया गया है कि अंतिम एनआरसी में शामिल सभी व्यक्तियों को तुरंत राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जाएं और एनआरसी से बाहर किए गए लोगों को अस्वीकृति पर्ची जारी की जाए और अपील शुरू की जाए ताकि विदेशियों के लिए न्यायाधिकरण के समक्ष कानूनी निर्णय लिए जा सकें।
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