मद्रास उच्च न्यायालय के 'गौ कशी' पर प्रतिबंध से संबंधित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
Awaz E Bihar••17 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु में कहीं भी बकरीद या अन्य दिनों में गाय या बछड़े की कुर्बानी पर प्रतिबंध लगाया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की ओर से दायर स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया। राज्य सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें पूरे राज्य में गाय और बछड़ों की कुर्बानी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश का अंतिम अनुच्छेद, जिसमें राज्य भर में प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था, पहली नजर में संशोधन की मांग करता है। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी ने अपना पक्ष रखा। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट का आदेश तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट 1958 के विपरीत है। इस कानून के तहत अधिकृत प्राधिकरण द्वारा जारी प्रमाण पत्र के आधार पर 10 वर्ष से अधिक आयु की उन गायों को कुर्बानी देने की अनुमति दी जाती है, जो काम करने और प्रजनन के लिए अक्षम हो गई हैं। सरकार ने यह भी कहा कि प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट 1960, प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स (स्लॉटरहाउस) रूल्स 2001, तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट 1998 और तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज रूल्स 2023 जैसे अन्य कानून कुर्बानी की प्रक्रिया और शर्तों को नियंत्रित करते हैं, लेकिन उनमें कहीं भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है। राज्य का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध लगाकर हाई कोर्ट ने कानूनी ढांचे की जगह न्यायिक कानून बना दिया है। मद्रास हाई कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मी नारायणन शामिल थे, ने 27 मई को बकरीद से ठीक पहले यह आदेश जारी किया था। यह फैसला 'हिंदू मक्कल काची' के महासचिव के सूर्य प्रशांत की ओर से दायर की गई जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनाया गया था। याचिकाकर्ता ने केवल यह मांग की थी कि कुर्बानी निर्धारित स्थानों पर ही की जाए, लेकिन हाई कोर्ट ने इसके आगे बढ़ते हुए गाय और बछड़ों की कुर्बानी पर कहीं भी और किसी भी दिन पूर्ण प्रतिबंध लगाने का एक व्यापक आदेश दे दिया। अपना फैसला सुनाते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने एक सरकारी आदेश का हवाला दिया, जिसमें दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए गाय की कुर्बानी पर प्रतिबंध को आवश्यक बताया गया है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि बकरीद पर 'गौ कशी' इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक कार्य नहीं है। राज्य सरकार ने कहा कि जब मौजूदा कानून निर्धारित स्थानों पर गाय की एक विशिष्ट प्रजाति की कुर्बानी की अनुमति देता है, तो इसके विपरीत कोई न्यायिक निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है। सरकार ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश संख्या 1715 का हवाला दिया, जबकि इसकी कानूनी स्थिति या लागू होने का सवाल अदालत के सामने कभी नहीं उठाया गया था। सरकार का कहना है कि कोई भी प्रशासनिक आदेश राज्य में लागू कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता है। विशेष लीव पिटीशन में राज्य सरकार ने कहा कि हाई कोर्ट के सामने दायर की गई रिट पिटीशन केवल कोयंबत्तूर में बकरीद के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर 'गौ कशी' को रोकने तक सीमित थी। इसके बावजूद डिवीजन बेंच ने मामले का दायरा बढ़ाते हुए पूरे राज्य में हर स्थिति में गौ कशी पर प्रतिबंध लगा दिया, यहां तक कि अनुमोदित स्लॉटरहाउसों में भी, जबकि याचिकाकर्ता ने ऐसी कोई राहत नहीं मांगी थी। सरकार का कहना है कि अदालत ने ऐसी राहत प्रदान कर दी जिसके लिए न तो कोई अनुरोध किया गया था और न ही इसके बारे में चर्चा हुई थी। राज्य सरकार ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले के एक हिस्से में यह स्वीकार किया कि जानवरों की कुर्बानी केवल अनुमोदित स्लॉटरहाउसों में ही की जा सकती है, लेकिन दूसरी ओर उसने यह निर्देश भी दे दिया कि बकरीद या किसी भी दूसरे दिन कोई गाय या बछड़ा नहीं काटा जाना चाहिए। सरकार के अनुसार ये दोनों बातें एक दूसरे के विपरीत हैं और यह फैसला स्वयं ही विरोधाभासी हो जाता है। याचिका में सरकार ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट ने यह मान लिया कि सार्वजनिक स्थानों पर गौ कशी की जा रही थी या की जाएगी, जबकि पुलिस ने अपने जवाबी हलफनामे में स्पष्ट रूप से कहा था कि पहले ही सभी सावधानियां बरती जा चुकी हैं। सरकार के अनुसार यह सुनिश्चित किया गया था कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की कुर्बानी न हो और धार्मिक बल