राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण की लड़ाई जारी रहेगी: मौलाना महमूद मदनी
Awaz E Bihar••23 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों, मकानों और अन्य निर्माणों के खिलाफ जारी विध्वंस अभियान के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर विशेष याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रभावित व्यक्तियों को महत्वपूर्ण अंतरिम राहत प्रदान की है। जारी रिलीज के अनुसार अदालत ने संबंधित संपत्तियों के खिलाफ दो सप्ताह तक सभी विध्वंस अभियानों पर रोक लगाते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अपने कानूनी और संवैधानिक बिंदुओं के साथ राजस्थान हाई कोर्ट, जोधपुर की डिवीजन बेंच से संपर्क करें। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हज़रत मौलाना महमूद असद मदनी के निर्देश पर 40 प्रभावित लोगों की ओर से दायर इस याचिका की सुनवाई के दौरान जमीयत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने विस्तृत और प्रभावी तर्क प्रस्तुत किए, जबकि वरिष्ठ वकील हुजैफा अहमदी, निज़ाम पाशा, ताहिर हकीम और अधिवक्ता ऑन रिकॉर्ड मंसूर अली खान ने भी मामले का पालन किया। इसकी सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की बेंच के सामने हुई। यह स्पष्ट है कि 20 जून 2026 को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने राजस्थान के प्रभावित सीमावर्ती जिलों का दौरा किया, जिसने जमीनी स्थिति का जायजा लिया, प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और विध्वंस अभियानों का विवरण एकत्र किया। प्रतिनिधिमंडल की रिपोर्ट के आधार पर प्रभावित लोगों की ओर से लगभग 40 याचिकाएं राजस्थान हाई कोर्ट, जोधपुर में दायर की गईं, जबकि अन्य प्रभावित लोगों ने भी व्यक्तिगत रूप से अदालत से संपर्क किया, जिसके परिणामस्वरूप कुल लगभग 60 मामले अदालत के सामने आए। 7 जुलाई को तर्कों के पूरा होने के बाद राजस्थान हाई कोर्ट ने 13 जुलाई को अपना फैसला सुनाया, लेकिन वांछित कानूनी राहत न मिलने पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट से संपर्क किया। इस बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के उपाध्यक्ष मौलाना कारी मोहम्मद अमीन, जमीयत उलेमा-ए-हिंद राजस्थान के अध्यक्ष मौलाना हबीबुल्लाह कासमी, नाज़िम-ए-आला मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री और अन्य लगातार प्रभावित लोगों और वकीलों से संपर्क में रहे। अधिवक्ता ताहिर हकीम ने हाई कोर्ट में भी जमीयत उलेमा-ए-हिंद का प्रतिनिधित्व किया। आज सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि मकानों, मस्जिदों, मदरसों और अन्य संपत्तियों के खिलाफ लगातार विध्वंस अभियान जारी हैं, जबकि सैकड़ों धार्मिक और आवासीय संपत्तियों को नोटिस जारी किए गए हैं। किसी भी धार्मिक स्थल या नागरिक की संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई केवल संविधान, कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार की जा सकती है, न कि प्रशासनिक शक्तियों के एकतरफा उपयोग के माध्यम से। इसलिए, यदि तत्काल अंतरिम सुरक्षा नहीं दी जाती है, तो यह अनिवार्य क्षति होगी। तर्कों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह तक विध्वंस अभियान पर अंतरिम रोक लगाते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों में विवादित तथ्यों का विस्तृत जायजा संबंधित हाई कोर्ट ही ले सकती है। इसलिए अदालत ने याचिकाकर्ताओं को राजस्थान हाई कोर्ट, जोधपुर की डिवीजन बेंच से संपर्क करने का निर्देश दिया। अदालत ने आज एक बार फिर अपने 13 नवंबर 2024 के ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया और स्पष्ट किया कि किसी भी विध्वंस अभियान में कानूनी प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक गारंटियों का पूर्ण पालन आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि जहां सार्वजनिक भूमि पर अवैध अतिक्रमण साबित हों वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन प्रत्येक मामले को उसके तथ्यों के अनुसार परखा जाएगा और सुप्रीम कोर्ट के मार्गदर्शक सिद्धांतों के प्रकाश में संबंधित हाई कोर्ट उपयुक्त निर्णय लेगी। इस बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने कहा कि अदालत के निर्देश के अनुसार राजस्थान हाई कोर्ट, जोधपुर की डिवीजन बेंच से तुरंत संपर्क करेंगे। जमीयत उलेमा-ए-हिंद प्रभावित नागरिकों, मस्जिदों, मदरसों और अन्य धार्मिक स्थलों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए हर कानूनी मंच पर पूरी ताकत के साथ मामला लड़ती रहेगी। हमें विश्वास है कि कानून और न्याय की सर्वोच्चता स्थापित होगी।