देश में मुसलमानों पर जीना मुश्किल कर दिया गया है : मौलाना अरशद मदनी
Awaz E Bihar••14 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
उत्तराखंड के जमीयत उलेमा हिंद की कार्यकारी समिति की बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि देश की स्थिति इस समय अत्यंत चिंताजनक है। जारी विज्ञप्ति के अनुसार उन्होंने दावा किया कि संविधान और लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है और अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों पर जीवन तंग कर दिया गया है। भेदभाव, अन्याय और नफरत का सिलसिला अपने चरम पर पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि आज देश में सत्ता में बैठे लोग खुद को ही कानून मानने लगे हैं और तानाशाही उनके स्वभाव का हिस्सा बनती जा रही है। भारतीय संविधान की भावना को आहत किया जा रहा है और लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर किया जा रहा है, देश बर्बादी के अंतिम संकेत को छू रहा है जिसके गंभीर परिणाम पूरे देश को भुगतने पड़ सकते हैं।
मौलाना मदनी ने सख्त लहजे में कहा कि बुलडोजर आज न्याय का नहीं बल्कि बदला, पक्षपात और नफरत की राजनीति का प्रतीक बन गया है। कानून और अदालतों की अनदेखी करते हुए लोगों के घरों, दुकानों और पूजा स्थलों को ध्वस्त करना संविधान के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है और न्याय के दोहरे मापदंड से अशांति और बर्बादी के रास्ते खुलते हैं। यदि सरकारें अदालतों की जगह बुलडोजर से न्याय करने लगें तो फिर कानून के शासन और नागरिक अधिकारों का क्या अर्थ रह जाता है? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि बुलडोजर चलाकर किसी का घर तोड़ना सजा नहीं अपराध है, अदालत ने यह भी कहा था कि सरकार जज नहीं बन सकती, कानूनी और गैरकानूनी निर्धारण न्यायपालिका ही करेगी।
मौलाना मदनी ने कहा कि जिन मदरसों और मस्जिदों पर आज बुलडोजर चलाए जा रहे हैं, उन संस्थानों के उलेमा ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ 1803 में सबसे पहले स्वतंत्रता का फतवा दिया और फिर इसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता संग्राम के अनुयायियों ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। आज उन संस्थानों को पक्षपात और नफरत के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है। इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में सरकार की ओर से सांप्रदायिक तत्वों का खुला समर्थन और कानूनी संस्थानों की चुप्पी के कारण जिस तरह से नफरत की राजनीति को बढ़ावा मिला है, उससे उन मूल्यों को जबरदस्त नुकसान पहुंचा है जो हमारे देश की सदियों पुरानी सभ्यता और परंपरा का हिस्सा रहे हैं और जिनका आधार विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के बीच परस्पर एकता और प्रेम पर टिका हुआ था।
उन्होंने कहा कि सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि आज मुसलमानों से देशभक्ति और वफादारी का प्रमाण पत्र वे लोग मांग रहे हैं जिनके पूर्वजों के बारे में इतिहास में अंग्रेजी सरकार से माफीनामे और समझौते के उदाहरण दर्ज हैं, जबकि मुसलमानों और उनके अकाबिर ने देश की स्वतंत्रता के लिए कुर्बानियां दीं, जेल काटी और अपनी जान की आहुति दी। इन गंभीर परिस्थितियों के मद्देनजर 14 और 15 मई को नई दिल्ली में जमीयत उलेमा हिंद की कार्यकारी समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें विस्तृत विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि विभिन्न धर्मों के बीच परस्पर सहिष्णुता, मानवता के सम्मान और परस्पर सहयोग के प्रचार के लिए हर स्तर पर 'हिंदू-मुस्लिम एकता आंदोलन' (और अन्य अल्पसंख्यकों और धर्मों के बीच एकता का संदेश) के लिए छोटे और बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और इसे एक आंदोलन के रूप में पूरे देश में पेश किया जाएगा।
इस उद्देश्य के तहत हर स्तर पर छोटे और बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें सभी धर्मों की ऐसी महत्वपूर्ण हस्तियों को आमंत्रित किया जाएगा जो न केवल हमविचार हों बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता और शक्ति भी रखते हों। यह भी तय किया गया कि 'हिंदू-मुस्लिम एकता आंदोलन' के तहत आयोजित होने वाले सभी कार्यक्रम पूरी तरह से गैर-राजनीतिक होंगे और उनका उद्देश्य सामाजिक सौहार्द, धार्मिक सहिष्णुता और परस्पर भाईचारे को बढ़ावा देना होगा।
मौलाना मदनी ने कहा कि खुशी की बात यह है कि देश की अधिकांश आबादी आज भी प्रेम, भाईचारे और परस्पर सहयोग पर विश्वास करती है। दुर्भाग्य से नफरत के शोर में प्रेम की आवाजें दब कर रह गई हैं, लेकिन यह भी सच है कि प्रेम और भलाई की रोशनी कभी खत्म नहीं होती। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा हिंद अतीत में भी देश की एकता, सांप्रदायिक सौहार्द और हर प्रकार की अतिवाद के खिलाफ अग्रणी भूमिका निभाती रही है और आज भी अपने व्यापक और सम्मानित मंच के माध्यम से शांति, प्रेम और न्याय की आवाजों को ताकत प्रदान करेगी। जमीयत उलेमा हिंद की केंद्रीय समिति ने इस आंदोलन को प्रभावी, संगठित और जनस्तर पर सफल बनाने के लिए जिला और स्थानीय जम