
फिल्म निर्माता और निर्देशक कमाल अमरोही के रूप में एक साहित्यकार
कमाल अमरोही का नाम ध्यान में आते ही फिल्म 'पाकीजा' का ख्याल जरूर ध्यान में आता है। हालांकि उन्होंने अन्य फिल्में भी बनाईं, लेकिन इस शाहकर फिल्म के निर्माता कमाल अमरोही का यह ड्रीम प्रोजेक्ट था। बेहतरीन संवाद, संगीत, और मीना कुमारी की बेमिसाल अभिनय के कारण इस फिल्म ने दर्शकों के दिल और दिमाग पर ऐसे निशान छोड़े जिन्हें आज तक मिटाया नहीं जा सका है। इसके गीतों में इतना आकर्षण है कि आज भी जब फिल्म 'पाकीजा' के गीत कहीं सुनाई देते हैं, तो लोगों के दिल की धड़कनें थम जाती हैं और लोग सम्मोहित हो जाते हैं।
कमाल अमरोही का जन्म 17 जनवरी 1917 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में हुआ था। उनके फिल्म उद्योग में प्रवेश का वृत्तांत भी कम रोचक नहीं है। कहा जाता है कि वे बचपन में अत्यधिक शरारती थे और अपनी शरारतों से पूरे गांव की नाक में दम किए रहते थे। एक बार उनकी माता ने उन्हें जोरदार पिटाई की, तो उन्होंने अपनी माता से वादा किया कि एक दिन वे अत्यधिक प्रसिद्ध व्यक्तियों में शामिल किए जाएंगे और उनके دامن को सोने चांदी के सिक्कों से भर देंगे।
इस बीच, एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी जिंदगी का रुख ही बदल दिया। हुआ यह कि उनके बड़े भाई ने उनकी शरारतों से तंग आकर उन्हें तमाचा मार दिया। गुस्से से भरे कमाल अमरोही घर छोड़कर लाहौर भाग गए। लाहौर ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। उन्होंने बड़ा आदमी बनने का संकल्प कर लिया था। उन्होंने कड़ी मेहनत की और प्राचीन भाषा में मास्टर की डिग्री प्राप्त की। वे अत्यधिक बुद्धिमान थे। इसका अनुमान इस बात से लगता है कि उन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में ही एक उर्दू अखबार में स्तंभ लेखन शुरू कर दिया था। अखबार के संपादक उनकी प्रतिभाओं के इतने प्रशंसक हुए कि उस समय उन्होंने 300 रुपये उनका वेतन निर्धारित किया, जो उस समय एक बड़ी राशि मानी जाती थी।
कमाल अमरोही का फिल्मी करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। यह फिल्म रहस्य और रोमांस से भरपूर थी। फिल्म निर्माता अशोक कुमार ने इसका निर्देशन का जिम्मा कमाल अमरोही को सौंपा। बेहतरीन गीतों और संगीत के कारण यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई और इसके बाद से ही फिल्मों में सस्पेंस का चलन शुरू हो गया। फिल्म की जबरदस्त सफलता ने मधुबाला और लता मंगेशकर को नई पहचान दिलाई। इसके बाद से कमाल अमरोही ने 1953 में कमाल पिक्चर्स और 1958 में कमालस्तान स्टूडियो की स्थापना की। इसके बैनर तले उन्होंने अपनी पत्नी मीना कुमारी के साथ एक आर्ट फिल्म 'दायरा' बनाई, लेकिन यह फिल्म सफल नहीं हो सकी।
कमाल अमरोही की शायरी में वही रस है जो इस परिवार के शायरों का ट्रेडमार्क रहा है। रईस अमरोही और जॉन एलिया की भाषा में जो लोच और जो चाशनी है, वही कमाल अमरोही की भाषा में भी है। नमूने के तौर पर उनकी इस गजल का अंदाजा लगाया जा सकता है:
साज़ दिल, नग्मा जां, रूह फ़िज़ा है क्या है?
तू करन है कि शफ़क़ है कि सबा है क्या है?
प्यास की आग बुझा दी है तेरी क़ुर्बत ने
तू समुंदर है कि दरिया है, घटा है क्या है?
तेरी आंखों में कई रंग झलकते देखे
सादगी है कि झिजक है कि हया है क्या है?
नाम होंठों पे तेरा आए तो तस्कीन मिले
राहत जां है, दिलासा है, दुआ है क्या है?
कमाल अमरोही का निधन 11 फरवरी 1993 को हुआ। उनकी मृत्यु पर उनके चचेरे भाई और जादुई लहजे के शायर जॉन एलिया ने जो श्रद्धांजलि दी, वह एक बाकमाल शख्सियत को एक शायर बाकमाल का सच्चा सलाम है।



