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हिंदू होने के लिए किसी विशेष धर्म, भाषा या नारे की शर्त नहीं: प्रोफेसर अपुरवानंद
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हिंदू होने के लिए किसी विशेष धर्म, भाषा या नारे की शर्त नहीं: प्रोफेसर अपुरवानंद

Awaz E Bihar
•4 अक्टूबर 2026 को 07:14 pm बजे•1 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

पटना: पूर्व मंत्री और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण अमानुल्लाह की तीसरी बरसी के अवसर पर पटना के एक्सिबिशन रोड स्थित होटल रिपब्लिक में "हिंदुस्तानी होने की मुश्किल: लोकतंत्र में सिक्युलरिज्म की क्या अवधारणा है?" विषय पर प्रसिद्ध विद्वान और प्रोफेसर अपूरवानंद ने एक प्रभावशाली और चिंतनशील व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आज हिंदुस्तानी होने की परिभाषा को विभिन्न मापदंडों से परखने की कोशिश की जा रही है, जो देश के लोकतांत्रिक और सिक्युलर स्वभाव के लिए चिंताजनक है। प्रोफेसर अपूरवानंद ने कहा कि 2019 ई. भारत की राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इसी वर्ष बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि 1949 ई. में बाबरी मस्जिद के अंदर मूर्ति रखना अवैध था और दिसंबर 1992 ई. में मस्जिद का विध्वंस भी कानून का उल्लंघन था। अदालत ने यह भी कहा कि इस बात का कोई निश्चित प्रमाण नहीं है कि किसी मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद का निर्माण किया गया था। इसके बावजूद राम मंदिर के निर्माण के लिए भूमि प्रदान करने का निर्णय लिया गया। उन्होंने कहा कि इसी अवधि में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के माध्यम से नागरिकता के मामले में धर्म को शामिल किया गया। यह भारतीय संविधान की मूल भावना और सिक्युलर लोकतंत्र की अवधारणा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या किसी नागरिक की नागरिकता उसके धर्म की आधार पर निर्धारित की जा सकती है? प्रोफेसर अपूरवानंद ने कहा कि बंगाली बोलने वाले मुसलमानों के संबंध में भी ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जहां भारतीय नागरिक होने के बावजूद उन्हें हिरासत केंद्रों में भेजने या बांग्लादेश भेजने की कोशिश की गई, जबकि बांग्लादेश भी कुछ ऐसे व्यक्तियों को अपना नागरिक मानने से इनकार करता है। यह स्थिति मानवाधिकारों और नागरिकता की मूल अवधारणा पर गंभीर प्रश्न उठाती है। उन्होंने कहा कि जम्मू और कश्मीर में धारा 370 की रद्दी के बाद वहां भूमि खरीदने और विवाह से संबंधित जो बातें सामने आईं, उन्हें भी भारतीय राष्ट्रवाद की बदलती अवधारणा के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। अब कुछ स्थानों पर वंदे मातरम् पढ़ने या विशेष राष्ट्रीय अभिव्यक्ति को राष्ट्रभक्ति के मापदंड के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदुस्तानी होने के लिए किसी विशेष धर्म, भाषा, वस्त्र, नारे या गीत का पालन नहीं होना चाहिए। हिंदुस्तानी होने की वास्तविक आधार संविधान, समानता, स्वतंत्रता, न्याय और सभी नागरिकों के समान अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसके विविधता में है और लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हर नागरिक को बिना भेदभाव के समान भारतीय माना जाए। प्रवीण अमानुल्लाह की सेवाओं को समर्पित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने अपनी पूरी जीवन सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों, महिलाओं के अधिकारों और सामुदायिक सद्भाव के लिए समर्पित किया। उनकी बरसी के अवसर पर ऐसे विषय पर चर्चा वास्तव में उनके विचारों और संघर्ष को समर्पण भी है। व्याख्यान के आरंभ से पहले प्रवीण अमानुल्लाह के चाचा 90 वर्षीय पूर्व विधायक वसी अहमद ने उनकी सामाजिक जीवन पर विस्तृत प्रकाश डाला। इसके पहले उनके पति पूर्व आईएएस अफ़ज़ल अमानुल्लाह ने अतिथियों और वक्ताओं का स्वागत करते हुए कार्यक्रम का आरंभ किया। वहीं अंत में रहमत अमानुल्लाह ने शानदार अंदाज में धन्यवाद प्रस्ताव पेश किया। इस व्याख्यान में पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश खतम रज़ा, जस्टिस मेहर झा, प्रसिद्ध सर्जन डॉ. अहमद अबदुल हई, फरहत हसन, इस्लाम अहमद पूर्व आईएएस, नैर हसनैन खान, एडीजे, पूर्व विधायक गुजेंद्र शाही उर्फ मना शाही, डॉ. आज़हार अहमद, बीपीएससी के पूर्व सदस्य शहनवाज़ खान, अमीर आफ़ाक अहमद फ़ैज़ी, एसएम प्रवीज़ अलम, बिहार अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष नौशाद अहमद, डॉ. ग़ियासुद्दीन राई, डॉ. अनवरुलहदी, डॉ. फ़ैज़ अहमद क़ादरी, फ़हीम अहमद, तनवीर रज़वी, शहाब रज़वी, असलम अल्लाह खान, राशिद रज़ा खान, असफ़र अहमद वार्ड काउंसिलर, क़ैस अहमद, डॉ. अशरफ़ुल नबी क़ैसर, शहज़ाद अनवर अंसारी, शमीम अंसारी, मबीनुलहदी, इफ़्तखार अहमद, आफ़ाक अहमद, रियाज़ अहमद, शारक बिलाल, मोहम्मद आज़ाद, फ़खरुद्दीन, प्रोफेसर इक़बाल शिराज़ी, अरशद अजमल, रोपेश, अफ़ज़ल हसन, इक़बाल इमाम, के अलावा सैयद मनोर अशरफ़, उज़मत अमानुल्लाह, अरीब यूसुफ़ अमानुल्लाह, आदि उपस्थित थे।
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