
पर्चा लीक के विरुद्ध कठोर प्रावधानों वाला संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश
Awaz E Bihar••21 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
सरकार ने सोमवार को लोकसभा में "लोक प्रीक्षा (अवैध साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026" पेश किया, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में पेपर लीक और संगठित परीक्षा धांधली पर कड़ी पकड़ हासिल करना है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी और कार्मिक राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने विपक्ष के हंगामे के बीच यह विधेयक सदन में पेश किया। विधेयक में दोषियों के लिए 10 साल तक की कैद, 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, संपत्ति की जब्ती, विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों, निर्धारित अवधि में जांच और सुनवाई सहित कई कड़ी नई धाराएं शामिल की गई हैं।
सरकार का कहना है कि हाल के वर्षों में विभिन्न परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इन घटनाओं को रोकने और दोषियों के खिलाफ त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कानून को और मजबूत किया जा रहा है। यह विधेयक "लोक प्रीक्षा (अवैध साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024" में संशोधन का प्रस्ताव रखता है।
संशोधन विधेयक के तहत सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस कानून के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने और उन्हें अधिसूचित करने का अधिकार दिया जाएगा। इन अदालतों में मामलों की सुनवाई दैनिक आधार पर होगी और आरोप पत्र दाखिल होने के बाद तीन महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसी तरह, उच्च न्यायालय में दायर अपीलों का भी तीन महीने के भीतर निपटारा करने का प्रस्ताव रखा गया है।
विधेयक के अनुसार, केंद्र सरकार को आवश्यकता पड़ने पर किसी भी मामले की जांच के लिए विशेष टास्क फोर्स (स्पेशल टास्क फोर्स) गठित करने का अधिकार भी प्राप्त होगा। इसके अलावा, कानून के तहत दर्ज मामलों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करना अनिवार्य होगा। राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन मामलों की प्रभावी पैरवी के लिए एक या एक से अधिक विशेष सरकारी वकील (स्पेशल पब्लिक प्रोसीक्यूटर) नियुक्त करने का अधिकार भी दिया जाएगा।
विधेयक में संगठित तरीके से पेपर लीक करने, परीक्षाओं में अवैध साधनों का उपयोग करने या ऐसे अपराधों में शामिल व्यक्तियों के लिए दंड में वृद्धि करते हुए दो साल से 10 साल तक की कैद और एक करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा, अदालत को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत अतिरिक्त दंड देने का अधिकार भी प्राप्त होगा।
विधेयक की धाराओं के अनुसार, यदि कोई सेवा प्रदाता संस्था, एजेंसी या कंपनी इस प्रकार के अपराध में शामिल पाई जाती है, तो उस पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इसके साथ ही, परीक्षा के आयोजन पर आने वाली वास्तविक लागत भी संबंधित संस्था से वसूली जाएगी और उसे चार साल तक किसी भी परीक्षा संबंधी कार्य से वंचित किया जा सकता है।
यदि किसी सेवा प्रदाता संस्था के निदेशक, वरिष्ठ प्रशासन, अधिकारी, कर्मचारी या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति अपराध में शामिल पाए जाते हैं, तो उन्हें भी दो से 10 साल तक की कैद और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का सामना करना होगा। विधेयक में यह भी प्रस्ताव किया गया है कि यदि कोई परीक्षा प्राधिकरण, उससे संबद्ध संस्था या कोई संगठित समूह इस अपराध में शामिल पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ पांच से 10 साल तक की कैद और कम से कम एक करोड़ रुपये के जुर्माने जैसी कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
संशोधन विधेयक के तहत अपराध से प्राप्त की गई संपत्ति को जब्त करने का भी प्रस्ताव रखा गया है, ताकि अवैध गतिविधियों से प्राप्त होने वाले वित्तीय लाभ को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।
सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वास को और मजबूत बनाना, युवाओं का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा बढ़ाना और पेपर लीक और संगठित परीक्षा माफिया के खिलाफ प्रभावी और निर्धारित अवधि में कार्रवाई सुनिश्चित करना है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद यह संशोधन विधेयक संसद में पेश किया गया है।
तीन बार स्थगित होने के बाद जब शाम पांच बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई, तो विपक्षी सदस्यों ने नारेबाजी शुरू कर दी और प्लेकार्ड लेकर सदन के मध्य में आ गए। कार्यवाही के अध्यक्ष कृष्ण प्रसाद तेनेटी ने हंगामा करने वाले सदस्यों से अपनी सीटों पर वापस जाने की अपील करते हुए कहा कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण विधेयक है। उन्होंने कहा कि इसकी प्रति पहले ही सभी सदस्यों को उपलब्ध करा दी गई है, इसलिए उन्हें इस पर चर्चा में भाग लेना चाह
सरकार का कहना है कि हाल के वर्षों में विभिन्न परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रतिष्ठा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इन घटनाओं को रोकने और दोषियों के खिलाफ त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कानून को और मजबूत किया जा रहा है। यह विधेयक "लोक प्रीक्षा (अवैध साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024" में संशोधन का प्रस्ताव रखता है।
संशोधन विधेयक के तहत सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस कानून के तहत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने और उन्हें अधिसूचित करने का अधिकार दिया जाएगा। इन अदालतों में मामलों की सुनवाई दैनिक आधार पर होगी और आरोप पत्र दाखिल होने के बाद तीन महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसी तरह, उच्च न्यायालय में दायर अपीलों का भी तीन महीने के भीतर निपटारा करने का प्रस्ताव रखा गया है।
विधेयक के अनुसार, केंद्र सरकार को आवश्यकता पड़ने पर किसी भी मामले की जांच के लिए विशेष टास्क फोर्स (स्पेशल टास्क फोर्स) गठित करने का अधिकार भी प्राप्त होगा। इसके अलावा, कानून के तहत दर्ज मामलों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करना अनिवार्य होगा। राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन मामलों की प्रभावी पैरवी के लिए एक या एक से अधिक विशेष सरकारी वकील (स्पेशल पब्लिक प्रोसीक्यूटर) नियुक्त करने का अधिकार भी दिया जाएगा।
विधेयक में संगठित तरीके से पेपर लीक करने, परीक्षाओं में अवैध साधनों का उपयोग करने या ऐसे अपराधों में शामिल व्यक्तियों के लिए दंड में वृद्धि करते हुए दो साल से 10 साल तक की कैद और एक करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा, अदालत को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत अतिरिक्त दंड देने का अधिकार भी प्राप्त होगा।
विधेयक की धाराओं के अनुसार, यदि कोई सेवा प्रदाता संस्था, एजेंसी या कंपनी इस प्रकार के अपराध में शामिल पाई जाती है, तो उस पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इसके साथ ही, परीक्षा के आयोजन पर आने वाली वास्तविक लागत भी संबंधित संस्था से वसूली जाएगी और उसे चार साल तक किसी भी परीक्षा संबंधी कार्य से वंचित किया जा सकता है।
यदि किसी सेवा प्रदाता संस्था के निदेशक, वरिष्ठ प्रशासन, अधिकारी, कर्मचारी या अन्य जिम्मेदार व्यक्ति अपराध में शामिल पाए जाते हैं, तो उन्हें भी दो से 10 साल तक की कैद और एक करोड़ रुपये तक के जुर्माने का सामना करना होगा। विधेयक में यह भी प्रस्ताव किया गया है कि यदि कोई परीक्षा प्राधिकरण, उससे संबद्ध संस्था या कोई संगठित समूह इस अपराध में शामिल पाया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ पांच से 10 साल तक की कैद और कम से कम एक करोड़ रुपये के जुर्माने जैसी कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
संशोधन विधेयक के तहत अपराध से प्राप्त की गई संपत्ति को जब्त करने का भी प्रस्ताव रखा गया है, ताकि अवैध गतिविधियों से प्राप्त होने वाले वित्तीय लाभ को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।
सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वास को और मजबूत बनाना, युवाओं का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा बढ़ाना और पेपर लीक और संगठित परीक्षा माफिया के खिलाफ प्रभावी और निर्धारित अवधि में कार्रवाई सुनिश्चित करना है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद यह संशोधन विधेयक संसद में पेश किया गया है।
तीन बार स्थगित होने के बाद जब शाम पांच बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरू हुई, तो विपक्षी सदस्यों ने नारेबाजी शुरू कर दी और प्लेकार्ड लेकर सदन के मध्य में आ गए। कार्यवाही के अध्यक्ष कृष्ण प्रसाद तेनेटी ने हंगामा करने वाले सदस्यों से अपनी सीटों पर वापस जाने की अपील करते हुए कहा कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण विधेयक है। उन्होंने कहा कि इसकी प्रति पहले ही सभी सदस्यों को उपलब्ध करा दी गई है, इसलिए उन्हें इस पर चर्चा में भाग लेना चाह
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