शिक्षा पर हमला या नफरत की राजनीति का बेनकाब चेहरा?
Awaz E Bihar••3 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
डॉक्टर सैयद तबिश इमाम कश्मीर—यह नाम आते ही बर्फ से ढकी पहाड़ियों, नीलगोण जھीलों और हरे-भरे वादियों के दृश्य उभरते हैं, मगर हकीकत में यह क्षेत्र महज प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति, शक्ति के संघर्ष, पहचान के संघर्ष और राज्य के निर्णयों के परीक्षण का प्रतीक भी है। कश्मीर में लिया गया हर निर्णय सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्रीय कथा, विचारधारात्मक प्राथमिकताओं और राजनीतिक दिशा का प्रतिबिंब बन जाता है। यहां किसी सड़क का निर्माण हो, किसी विश्वविद्यालय की स्थापना या किसी शैक्षणिक संस्थान का बंद होना—हर कदम अपने अर्थ, प्रतीकात्मक भार और दूरगामी प्रभावों से भरा होता है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में जब किसी मेडिकल कॉलेज को मंजूरी दी जाती है, तो वह महज एक शैक्षणिक परियोजना नहीं होती बल्कि स्वास्थ्य, मानव सेवा, सामाजिक विकास और भविष्य के सपनों का प्रतिनिधित्व करता है। मेडिकल कॉलेज एक ऐसा संस्थान होता है जो न केवल डॉक्टरों की कमी को पूरा करता है बल्कि पूरे क्षेत्र के स्वास्थ्य प्रणाली, अनुसंधान, रोजगार और सामाजिक विश्वास को मजबूत बनाता है। लेकिन जब इस संस्थान को मंजूरी राजनीतिक दबाव, धार्मिक विरोध और सड़कों पर उठने वाले नारों के सामने झुकनी पड़ती है, तो सवाल महज एक कॉलेज के बंद होने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह राज्य की मंशा, राजनीतिक नैतिकता और राष्ट्रीय विवेक पर प्रहार करने लगता है। जम्मू-कश्मीर में माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज को मंजूरी देने का निर्णय इस श्रृंखला की एक चिंताजनक कड़ी है। बाहरी तौर पर यह निर्णय प्रशासनिक खामियों, बुनियादी ढांचे की कमी और "राज्य के हित" के नाम पर लिया गया, मगर जमीनी सच्चाई और घटनाओं के क्रम इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं कि यह निर्णय राजनीतिक दबाव और धार्मिक संगठनों की संगठित विरोधी राजनीति का सीधा परिणाम था। तथ्यों के संदर्भ में देखा जाए तो यह महज एक शैक्षणिक संस्थान की बंदी नहीं बल्कि नफरत की राजनीति का वह उजागर चेहरा है जो अब बिना झिझक शिक्षा के द्वार पर दस्तक दे रहा है। माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज को जम्मू-कश्मीर की सरकार ने पिछले साल ही मंजूरी दी थी। इस मंजूरी के पीछे एक अनिवार्य सच्चाई थी: घाटी में मानकों वाले चिकित्सा संस्थानों और डॉक्टरों की भारी कमी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में प्रति हजार लोगों पर डॉक्टरों की संख्या लगभग 0.8 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 1.3 के करीब है। ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में यह दर और भी कम हो जाती है। ऐसे हालात में एक नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना महज शैक्षणिक आवश्यकता नहीं बल्कि मानवीय समस्याओं और जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण और आवश्यक प्रश्न था। देश के अन्य हिस्सों में स्थापित मेडिकल कॉलेज की तरह ही माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज में भी प्रवेश का पूरा तंत्र राष्ट्रीय स्तर पर लागू NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) के तहत तय किया गया। NEET का उद्देश्य यह था कि देश भर में मेडिकल शिक्षा में मेरिट, पारदर्शिता और समानता को सुनिश्चित किया जाए और धर्म, जाति, क्षेत्र या राजनीतिक हस्तक्षेप के सभी दरवाजे बंद कर दिए जाएं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी प्रकार के विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान अपने कई निर्णयों में—विशेष रूप से TMA Pai Foundation और Christian Medical College जैसे मामलों में—स्पष्ट किया है कि मेडिकल शिक्षा में प्रवेश मेरिट के आधार पर होंगे, न कि किसी धार्मिक या सामाजिक अनुपात के आधार पर। इसके बावजूद कॉलेज में समस्या तब उत्पन्न हुई जब NEET 2025 के परिणाम सामने आए। माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की स्वीकृत सीटों में बड़ी संख्या ऐसे छात्रों के हिस्से में आई जो मुसलमान थे और उनमें से अधिकांश का संबंध कश्मीर से था। यह कोई असामान्य बात नहीं थी। पिछले एक दशक में कश्मीर में शैक्षणिक जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और कश्मीरी छात्र—विशेष रूप से मुस्लिम छात्र—प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन यही "मेरिट की सफलता" कुछ राजनीतिक शक्तियों के लिए असह्य साबित हुई। अचानक सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। भाजपा के स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने यह कहना शुरू किया कि प्रवेश "एकतरफा" हैं, हिंदू छात्रों के साथ अन्याय हुआ है और "राज्य के हित" को नुकसान पहुंचाया गया है। सोशल मीडिया पर संगठित अभियान चलाया गया, भावनाओं को हवा दी गई, और मीडिया के एक विशिष्ट हिस्से ने इस मामले को शैक्षणिक चर्चा के बजाय धार्मिक विवाद का रूप दे दिया। यहां मूल प्रश्न यह है कि अगर प्रवेश एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के माध्यम से हुआ, जिस पर न तो र