सफदर इमाम कादरी के चुनिंदा राजनीतिक लेखों के संग्रह पर एक नज़र
परिचय और समीक्षा: शकील रशीद
उर्दू के अखबारी लेखन की एक शानदार परंपरा रही है। अगर उर्दू पत्रकारिता के बीते हुए इतिहास पर एक सरसरी सी भी नजर डाली जाए तो कॉलम लेखकों की एक ऐसी फेहरिस्त हमें नजर आ जाएगी जिसमें शामिल नाम उर्दू पत्रकारिता के क्षितिज पर हमेशा चमकते रहेंगे। अतीत में सर सैयद अहमद खान, पंडित रत्न नाथ सरशार, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना जफरुल्लाह खान और मौलाना हसरत मोहानी वगैरह से लेकर हाल के दिनों में जफर अन्सारी, ख्वाजा अहमद अब्बास और आज के मासूम मुरादाबादी, सुहेल अन्जम और वदूद साजिद वगैरह तक बहुत सारे कॉलम लेखक हैं जो देश-विदेश में पढ़े और पसंद किए जाते रहे हैं, इनमें से एक नाम सफदर इमाम कादरी का भी है। सफदर इमाम कादरी की पहचान के तीन पहलू हैं, वे एक अदीब हैं, एक मौलवी हैं और एक पत्रकार भी हैं। और इन तीनों ही हैसियत से लोग उन्हें जानते और पसंद करते हैं।
उनके कॉलमों को १३ अध्यायों में विभाजित किया गया है। इसके पहले सफदर इमाम कादरी के 'मुरव्वत' और संपादक का लिखा 'मुरव्वत-ए-मुरव्वत' है। 'मुरव्वत' में सफदर इमाम कादरी अपने कॉलमों के तत्वों का उल्लेख करते हुए लिखते हैं: "किसी भी दौर की शायरी, साहित्य या पत्रकारिता अगर ज़मीर की आवाज़ है तो यह भी याद रखना चाहिए कि शब्दों में विरोध की आग भरे बिना बहुत सारे मौकों से आप कामयाब नहीं गुजर सकते। मैंने अपने बहुत सारे कॉलमों में अपने कलेजे की आग और ज़बान के शोलों को शब्दों में उतारने की कोशिश की है। इस चरण में कई बार गम और गुस्से की एक तेज़ लहर दौड़ जाती है। कॉलम लेखक एक शहری भी होता है और एक आम आदमी के तौर पर भी उसे ज़िंदगी और हालात देखने पड़ते हैं। इसलिए मैंने अपने बहुत सारे राजनीतिक कॉलम गुस्से के आलम में लिखे हैं और सत्ताधारियों या संबंधित व्यक्तियों या दल से विरोध के तौर पर सुलूक रिवाज़ रखा है।"
संपादक ने क्यों सफदर इमाम कादरी के सिर्फ 'राजनीतिक कॉलमों' का चयन किया और संग्रह का नाम 'लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन' रखा? इस सवाल का जवाब संपादक के अत्यंत विचारोत्तेजक और लंबे 'मुरव्वत-ए-मुरव्वत' में मिल जाता है, वे लिखते हैं: "मैंने उनकी (सफदर इमाम कादरी की) बौद्धिक व्यक्तित्व के उस पहलू पर नजर रखने की कोशिश की जो विशेष तौर से राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सलामती के लिए उनकी फ़िक्रमंदी से बयान होता है। इसी मकसद से सफदर इमाम कादरी के लगभग एक सौ कॉलम जो पूरी तरह से राजनीतिक हैं और उन संस्थाओं पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करने के लिए माहौल बनाने की कोशिश के तौर पर सामने आए हैं जिनका गठन स्वतंत्रता संग्राम के बाद और थोड़े पहले एक आरज़ूमंदी के साथ हमारे देश के और नई दुनिया के निर्माताओं ने किया था। इसलिए इन कॉलमों के संग्रह का नाम 'लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन' तय किया गया है।"
संपादक ने इन कॉलमों को 'लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का मर्सिया' करार दिया है, वे लिखते हैं: "कुछ कॉलम बहुत दर्दनाक और पूरे सوز़ हैं। इसके साथ ही दर्जनों कॉलम ऐसे हैं जिनमें ऐसा महसूस होता है कि लिखने वाला गम और गुस्से में मुब्तिला है और बेअत्मीनानी के आलम में आवाज़-ए-बुलंद पेश कर रहा है। बहुत सारे कॉलमों में मानवीय बेचारगी का ऐसा अक्स उभरता है जैसे महसूस हो रहा हो कि आज का दानिश्वर कुछ कर पाने की हालत में नहीं है।"
यह तो सच है कि आज इस देश में जनता की एक बड़ी तादाद के साथ दानिश्वरों की एक बड़ी اک्सरियत बेचैनी, बेअत्मीनानी और बेचारगी के एहसास से दो-चार है और यह कॉलम लेखक भी उन्हीं की सफ़ में शामिल है। इसका पूरी तरह से इज़हार इन कॉलमों से होता है।
किताब के १३ अध्याय हैं। 'बाबरी मस्जिद: आखिरी फैसला', 'कांग्रेस: नए दौर का आगाज', 'विपक्ष: असली निशाने से दूर', 'सांप्रदायिक राजनीति के दाव-पेच', 'सत्ता का नशा', 'वंचित वर्गों के अधिकार', 'सत्ता की मुत्लक़ अलामत', 'लोकतांत्रिक तरीका-ए-कर ही एकमात्र ज़रिया', 'बिहार सरकार और राजनीति', 'नए राजनीतिक मोर्चे', 'शरीयत अदालत: एक सदी बाद', 'अल्पसंख्यक आबादी: राष्ट्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य' और 'वैश्विक राजनीति और समाज'। जैसा कि विषयों से ज़ाहिर है कि राजनीतिक हैं लेकिन जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, राजनीतिक होने के बावजूद इन कॉलमों में हालात-ए-हाज़रा का इतिहास समो दिया गया है।
यह एक ऐसा संग्रह है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। अपनी खामियों और ग़लतियों के एहसास के लिए भी और यह जानने के लिए भी कि देश किस दिशा में जा रहा है और इस समय नागरिकों को क्या करने की ज़रूरत है। यह संग्रह 'अर्शिया प