देश में खाद्य कमी, महंगाई और बेरोजगारी का संकट, जिम्मेदार कौन?
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सरफराज अहमद कासमी संपर्क: 8099695186 आज एक ओर दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालित कृषि और प्रौद्योगिकी के शिखर पर है, तो दूसरी ओर मानव इतिहास की सबसे पुरानी अभिशाप 'भुख' और खाद्य कमी अभी भी लगभग एक अरब लोगों के पेट में चीख रही है, ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 के ताजा आंकड़ों ने एक बार फिर इस कड़वी हकीकत को बेनकाब कर दिया है कि विकास के शोर के पीछे मानवता के बड़े हिस्से के लिए अभी तक पेट भरना सपने से ज्यादा कुछ नहीं है। दुनिया के 127 देशों में से भारत का 102वां स्थान, 25.8 के खतरनाक श्रेणी वाले स्कोर के साथ, इस दावे को झूठा साबित करता है कि देश खाद्य में आत्मनिर्भर हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी बार-बार गर्व से घोषणा करते हैं कि आज भारत दुनिया को अनाज निर्यात कर रहा है, चावल और गेहूं के उत्पादन में दुनिया का दूसरा बड़ा देश है, लेकिन सवाल यह है कि अगर अनाज गोदामों में सड़ रहा है तो नागरिक भूखे क्यों हैं? अगर देश खाद्य का सरप्लस उत्पादन करता है तो बच्चे कम वजन क्यों पैदा हो रहे हैं? महिलाएं आयरन की कमी का शिकार क्यों हैं? और लाखों लोग दो समय की रोटी के लिए राशन दुकान की लाइनों में क्यों खड़े हैं? ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत की 13.7 फीसद आबादी भुखमरी और खाद्य कमी का शिकार है। बच्चों में खाद्य कमी की दर 35.5 फीसद है। जबकि 2.1 फीसद बच्चे पांच साल की उम्र से पहले मर जाते हैं। 27.4 फीसद बच्चे कम वजन के साथ पैदा होते हैं और 15 से 49 साल की 53 फीसद महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। यह महज आंकड़े नहीं हैं बल्कि वे चीखती हुई हकीकतें हैं जो सरकारी घोषणाओं के शानदार पर्दे के पीछे दबा दी गई हैं, भुखमरी और खाद्य कमी का शिकार दुनिया के दस सबसे ज्यादा भूखे देशों में सोमालिया, दक्षिण सूडान, कांगो, मेडागास्कर, हैती, चाड, नाइजर, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, नाइजीरिया और पापुआ न्यू गिनी शामिल हैं, उपर के ये दस देश युद्ध, सूखा, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट के कारण भुखमरी के विनाशकारी स्तर का सामना कर रहे हैं लेकिन भारत जहां न तो युद्ध है न सूखे का सिलसिला, न ही राजनीतिक अस्थिरता, वहां भी भुखमरी और खाद्य कमी का सिलसिला जारी है और यह संकट और गंभीर होता जा रहा है, महंगाई सरचढ़ कर बोल रही है, आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? अलम यह है कि भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जिनकी अर्थव्यवस्थाएं कभी भारत से कमजोर मानी जाती थीं, अब हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में भारत से बेहतर स्थान पर हैं, इससे स्पष्ट है कि समस्या صرف गरीबी या आबादी की नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं और शासन की व्यवस्था की है, भारत में खाद्य का वितरण असमान है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, मध्याह्न भोजन योजना और मुफ्त राशन कार्यक्रम जैसी योजनाएं मौजूद हैं लेकिन उनके परिणाम, समाज के अंतिम वर्ग तक नहीं पहुंचते, कई पात्र परिवार राशन कार्ड से वंचित हैं, कई क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, खराब प्रशासन और असमान वितरण, प्रणाली को खोखला कर दिया है, खाद्य उत्पादन में वृद्धि अपनी जगह लेकिन जब 40 फीसद खाद्य बर्बाद हो जाए, जब गोदामों में अनाज चूहों का भोजन बन जाए और दूसरी ओर करोड़ों लोग खाली पेट सो जाएं तो यह केवल आर्थिक विफलता नहीं है बल्कि नैतिक पतन और मानवता का एक निम्न स्तर है, देश की नीति खाद्य की मात्रा पर केंद्रित है, गुणवत्ता और पोषण पर नहीं, यही कारण है कि बच्चे दोनों ऊंचाई और वजन में पीछे रह गए हैं, यह वह पीढ़ी है जो कमजोर शरीर और भुखमरी के साये में पल रही है, एक ऐसा पूंजी जिससे कोई राष्ट्र विकास नहीं कर सकता, भारत की भुखमरी की कहानी महज आर्थिक असमानता की दास्तान नहीं है बल्कि एक राजनीतिक धोखाधड़ी की दास्तान भी है, आत्मनिर्भरता के नारे ने हकीकत पर मिट्टी डाल दी है, सरकार खाद्य के उत्पादन को सफलता मानती है लेकिन भुखमरी के आंकड़े उस सफलता का मतम कर रहे हैं, जब तक खाद्य के न्यायपूर्ण वितरण, पोषण की आपूर्ति और मूलभूत स्वच्छता पर गंभीर ध्यान नहीं दिया जाएगा, हर सूचकांक, हर रिपोर्ट और हर वादा महज मौखिक संतुष्टि से ज्यादा कुछ नहीं होगा, यह क्षण विचार करने वाला है कि सोमालिया, दक्षिण सूडान और कांगो जैसे युद्धग्रस्त देशों के साथ भारत का उल्लेख एक ही सूची में हो, जिन देशों में वर्षों से गृह युद्ध है, उसके साथ खड़ा होना, इस देश के लिए शर्म की बात है, जो खुद को दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था कहता है, जो आत्मनिर्भर होने का हरा सपना दिखाता है, और विश्वगुरु होने का झूठा दावा करता है, विकास के नारे तब तक खोखले रहेंगे जब तक हर भारतीय बच्चे के हाथ में किताब और पेट म