हज क्या है? हज साहिब-ए-इस्तितात मुसलमानों पर एक फर्ज़ इबादत है, जिसकी अदायगी जिंदगी में एक मर्तबा ज़रूरी है। हज गुनाहों को मिटा देता है और इंसान को मासूम बच्चे की तरह बना देता है। हज मब्रूर इंसान को जन्नत का मुस्तहक बना देता है। इस्लाम के अहम फराइज़ शरई में एक अहम फ़रीज़ा शरई हज है, जिसके फर्ज़ होने पर उम्मत का इज्मा और इत्तिफाक है (अल-जामी लि-अहकाम अल-कुरआन लिल-कर्तबी: 142/4) *पहली इबादतगाह काबा है* इन्ना अव्वल बैत वुड़िआ लिल-नास लिल-लज़ी बि-बक्कत मुबराकन व हुदन लिल-आलमीन (आले इम्रान: आयत नंबर: 96) अनुवाद: बेशक पहला घर जो लोगों (की इबादत करने) के लिए बनाया गया वही है, जो मक्का में है, वह बाराका भी है और हिदायत का ज़रिया भी। पता चला कि सबसे पहली इबादतगाह 'काबा' है, जो मक्का मुकर्रमा में स्थित है और यह बैत अल-मुकद्दस से भी प्राचीन है, हालांकि अधिकांश मुस्तशरिकीन और पश्चिमी लेखक मक्का की प्राचीनता के कायल नहीं हैं; लेकिन मनसबा मिजाज पश्चिमी अहल-ए-इल्म ने भी मक्का के सबसे प्राचीन स्थान होने का इक्तिराफ किया है। (देखिए तफसीर माजिदी: 609/1) *जेबल अबू कुबैस से ऐलान हज* व-आज़िन फि-न-नास बिल-हज्जि यातुक रिजालन व अला कुल-ली दामिर यातीन मिन कुल-ली फज-इन अमीक (सूरह अल-हज: 27) अनुवाद: और लोगों में हज का ऐलान भी करो, तुम्हारे पास लोग पैदल और ऊंटनियों पर दूर-दूर से पैदल आएंगे। हजरत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास से रिवायत है कि अल्लाह तआला ने जब हजरत इब्राहिम -अलैहिस्सलाम- को हज के ऐलान का हुक्म फरमाया, तो हजरत इब्राहिम -अलैहिस्सलाम- ने अर्ज़ किया: ऐ मेरे परवरदिगार! मेरी आवाज़ कहाँ तक पहुँचेगी? इरशाद हुआ: ऐलान करना तुम्हारा काम है और आवाज़ पहुँचाना मेरे ज़िम्मे है; चुनांचे हजरत इब्राहिम -अलैहिस्सलाम- अबू कुबैस की पहाड़ी पर चढ़े और आवाज़ लगाई, ऐ लोगो! अल्लाह ने तुम्हें इसके घर के हज का हुक्म दिया है; ताकि वह तुम्हें इसके ज़रिये जन्नत में पहुँचाए और दोज़ख के अज़ाब से निजात अता फरमाए, लहज़ा तुम हज किया करो, अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत से इन सभी लोगों तक यह आवाज़ पहुँचा दी, जो आगे आने वाले थे, उन्होंने जवाब में कहा: "लब्बैक अल्लाहुम लब्बैक" तो जितनी रूहों ने जवाब दिया और जितनी बार जवाब दिया, वह सभी लोग उतनी ही बार हज की सआदत हासिल करेंगे, (तफसीर कुर्तबी: 38/12) इनमें वे लोग भी होंगे जो पैदल आएंगे और वे लोग भी होंगे जो दूर-दूर से पहुँचेंगे, "दामिर" ऐसी दबली ऊंटनी को कहते हैं जिसे लंबी यात्रा ने थका दिया हो, यहाँ ऊंटनी से सवारी की ओर इशारा है, यानी लोग दूर-दूर के इलाके से हज और उमरा के लिए हरम शरीफ का सफर करेंगे, इसमें इस बात की ओर भी इशारा हो गया कि हज के अफعال सवारी पर भी अन्जाम दिए जा सकते हैं और पैदल भी; हालांकि जो शख्स किसी बड़ी मशक्कत के बिना पैदल चल सकता हो, उसके लिए पैदल हज करना अफजल है; लेकिन तवाफ और सई से मुस्तस्ना है, जो शख्स पैदल तवाफ और सई कर सकता है, उसके लिए पैदल ही तवाफ और सई करना वाजिब है, बिला उज्र "व्हील चेयर" या किसी और सवारी पर तवाफ या सई करना सही नहीं है, अगर बिला उज्र सवारी या व्हील चेयर पर तवाफ और सई की, तो लौटाना होगा और जदम वाजिब होगा। (मुहित बरहानी: 440/4) *सफा और मारवा शआइर अल्लाह में से होने के साथ एक अजीम वाकिया की यादगार भी हैं* इन्नस-सफा वल-मारवा मिन शआइरिल्लाह, फम-न हज्जल-बैत अउ इअ्तामर फाला जुनाहा अलैहि एन यतववफा बिहिमा (सूरह अल-बकरा: 158) अनुवाद: बेशक सफा और मारवा अल्लाह तआला की निशानियों में से हैं, इसलिए जो शख्स हज या उमरा करे, उस पर इन दोनों की सई करने में मुज़ाक नहीं और जो अपनी खुशी से (ज्यादा) नेकी करे, तो अल्लाह (नेकी के) कदरदान (और इस से) खूब वाकिफ हैं। सफा और मारवा काबा के दाएं-बाएं दो पहाड़ियाँ हैं, हज में इन दोनों पहाड़ियों के बीच सई की जाती है, यह असल में इस वाकिया की यादगार है कि जब अल्लाह के हुक्म से हजरत इब्राहिम -अलैहिस्सलाम- ने हजरत इस्माइल -अलैहिस्सलाम- को मक्का में छोड़ा, तो उस समय यहाँ पानी का एक कतरा भी मयस्सर नहीं था, मशकीजा में थोड़ा सा पानी था, जो जल्द ही खत्म हो गया, जब हजरत इस्माइल -अलैहिस्सलाम- (जो अभी दूध पीते बच्चे थे) को प्यास लगी, तो हजरत हाजरा -अलैहास्स