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नये फ्रिज के युग में भी घड़े और सुराही का महत्व बरकरार
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नये फ्रिज के युग में भी घड़े और सुराही का महत्व बरकरार

Awaz E Bihar•14 मई 2026 को 08:03 pm बजे•24 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

पटना में जहां एक ओर आधुनिक फ्रिज हर घर की जरूरत बनता जा रहा है, वहीं गांवों और गरीब परिवारों में आज भी मिट्टी के घड़े और सुराही लोगों की प्यास बुझाने का सबसे सस्ता और विश्वसनीय साधन बने हुए हैं। बिना बिजली के पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने वाले ये मिट्टी के बर्तन आज भी "गरीबों का फ्रिज" कहलाते हैं। भारतीय पारंपरिक संस्कृति में घड़े और सुराही को विशेष महत्व प्राप्त रहा है। वे दोनों मिट्टी से बनाए जाते हैं। मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पानी को ठंडा रखने की क्षमता होती है। उनके बारीक छिद्रों से पानी धीरे-धीरे बाहर निकलकर वाष्प बन जाता है, जिससे अंदर मौजूद पानी ठंडा हो जाता है। गर्मियों में इस पानी को पीने से शरीर को ताजगी मिलती है और स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। फ्रिज के अत्यधिक ठंडे पानी की तुलना में घड़े का पानी अधिक फायदेमंद माना जाता है। गरीब परिवारों के लिए घड़ा और सुराही बहुत उपयोगी हैं क्योंकि उन्हें खरीदने में कम खर्च आता है और बिजली की भी जरूरत नहीं पड़ती। जहां बिजली की सुविधा नहीं होती, वहां भी लोग आसानी से उनका उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा वे पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित हैं क्योंकि उनसे किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता। घड़ा और सुराही केवल उपयोगी वस्तुएं नहीं बल्कि भारतीय परंपरा और ग्रामीण जीवन की पहचान भी हैं। आज जब लोग प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक चीजों की ओर फिर से बढ़ रहे हैं, तब घड़े और सुराही का महत्व फिर से बढ़ता दिखाई दे रहा है। सुराही बनाने वाले कारीगर राम कुमार ने बताया कि गर्मी बढ़ते ही सुराही की मांग काफी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि छोटी सुराही 80 से 120 रुपये जबकि बड़ी सुराही 150 से 300 रुपये तक बिकती है। मिट्टी से बनी सुराही का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है, जिससे लोगों को राहत मिलती है। उन्होंने बताया कि सुराही का पानी स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होता है क्योंकि यह फ्रिज के अत्यधिक ठंडे पानी की तरह नुकसान नहीं पहुंचाता। उन्होंने कहा कि बिजली की जरूरत नहीं होने के कारण गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए सुराही सबसे सस्ता और उपयोगी साधन है। उन्होंने कहा कि आधुनिक फ्रिज और प्लास्टिक के बर्तनों के बढ़ते उपयोग से पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की मांग प्रभावित हुई है। इसके बावजूद कुम्हार अपनी पारंपरिक कौशल और रोजगार को बचाए रखने के लिए निरंतर मेहनत कर रहे हैं। राम कुमार ने बताया कि आजकल बाजार में नल लगी सुराहियों की मांग तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की सुराही में नीचे एक छोटा नल लगा होता है। जिससे सुराही को बिना हिलाए आसानी से पानी निकाला जा सकता है। यह सुराही घरों, दुकानों और दफ्तरों में अधिक उपयोगी मानी जा रही है। उन्होंने बताया कि गर्मी के मौसम में इसकी बिक्री सामान्य सुराही की तुलना में अधिक होती है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगर राकेश ने बताया कि पहले की तुलना में अब लोग फिर से सुराही और घड़े की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुराही का पानी प्राकृतिक तरीके से ठंडा और स्वादिष्ट रहता है, जिससे शरीर को ताजगी मिलती है। कारीगर शिवनाथ ने बताया कि मिट्टी के बर्तन पर्यावरण मित्र होते हैं और उनमें बिजली का कोई खर्च नहीं आता। उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में सुराही गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए सबसे किफायती और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प साबित हो रही है। उन्होंने बताया कि घड़ा और सुराही का मौसम मार्च से जुलाई तक रहता है। गर्मी बढ़ते ही लोगों में मिट्टी के घड़े और सुराही की मांग तेजी से बढ़ जाती है। अप्रैल, मई और जून में बिक्री सबसे अधिक होती है क्योंकि लोग ठंडा और शुद्ध पानी पीने के लिए उनका उपयोग करते हैं। बारिश शुरू होने के बाद मांग धीरे-धीरे कम हो जाती है। लेकिन कुछ लोग साल भर सुराही और घड़े का उपयोग करते हैं। शिवनाथ ने बताया कि घड़ा और सुराही का मौसम समाप्त होने के बाद इस व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए रोजी रोटी चलाना एक चुनौती बन जाता है। उन्होंने कहा कि बाकी महीनों में वे दिए, कुल्हड़, गुलदान, मिट्टी के बर्तन और सजावटी सामग्री बनाकर बेचते हैं। कई कुम्हार खेती और मजदूरी का काम भी करते हैं ताकि परिवार का खर्च चल सके। उन्होंने बताया कि त्योहारों और शादी विवाह के मौसम में मिट्टी की वस्तुओं की मांग बढ़ने से कुछ राहत मिलती है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक कुम्हारी कौशल ही उनके परिवार की असली पहचान और रोजगार का आधार है। स्थानीय कुम्हार श्रीकांत ने बताया कि मिट्टी का घड़ा बनाने में काफी मेहनत और धैर्य लगता है। उन्होंने कहा कि पहले अच्छी मिट्टी इकट्ठा की जाती है, फिर उसे
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