’’ज्ञान ही शक्ति है‘‘ के स्थान पर ’’शक्ति ही ज्ञान है‘‘ का सिद्धांत मानव सभ्यता के लिए खतरनाक: प्रोफेसर شم्भूनाथ
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पटना, ५ अगस्त: (एबीएन) ज्ञान, सभ्यता, लोकतंत्र के बदलते परिदृश्य के बीच ज्ञान के भविष्य पर गंभीर विचार करने की आवश्यकता पर बल देते हुए खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी में खुदा बख्श खान के अवसर पर आयोजित वार्षिक खुदा बख्श व्याख्यान में देश के प्रमुख विचारक, आलोचक और साहित्यकार प्रोफेसर शंभूनाथ ने कहा कि आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां 'ज्ञान ही शक्ति है' की अवधारणा को बदलकर 'शक्ति ही ज्ञान है' का सिद्धांत बढ़ावा दिया जा रहा है, जो मानव सभ्यता, लोकतांत्रिक मूल्यों और बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर चुनौती है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ज्ञान के प्रसार का एक महत्वपूर्ण साधन जरूर है, लेकिन यह मानव अनुसंधान, आलोचनात्मक जागरूकता, नैतिक दृष्टि और रचनात्मक विचार का कभी भी विकल्प नहीं बन सकती।
खुदा बख्श खान के अवसर पर खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी में आयोजित वार्षिक खुदा बख्श व्याख्यान में देश के प्रमुख साहित्यकार, विचारक, आलोचक और भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के निदेशक प्रोफेसर शंभूनाथ ने 'ज्ञान का भविष्य' विषय पर अत्यधिक विचारोत्तेजक और दृष्टि देने वाला भाषण देते हुए कहा कि मानव सभ्यता के पूरे इतिहास में ज्ञान की निरंतर अनुसंधान, प्रश्न उठाने और सत्य की खोज का इतिहास रहा है। आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के नए युग में प्रवेश कर चुकी है, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ज्ञान अपनी मूल आत्मा को बनाए रखेगा या केवल जानकारी और शक्ति का साधन बनकर रह जाएगा।
उन्होंने कहा कि ज्ञान की परंपरा किसी एक समय या एक आविष्कार की देन नहीं है, बल्कि सदियों की बौद्धिक साधना का परिणाम है। यह धारणा गलत है कि ज्ञान का प्रसार आज के डिजिटल युग की उत्पाद है। हर युग में विद्वानों ने अनुसंधान, संवाद, आलोचना और प्रयोग के माध्यम से मानव विचार को आगे बढ़ाया है। अंतर केवल साधनों का आया है, ज्ञान के मूल मूल्य नहीं बदले हैं।
प्रोफेसर शंभूनाथ ने कहा कि वर्तमान समय में एक खतरनाक प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसमें पुस्तकों, अनुसंधान और तर्क के बजाय भीड़, शोर और शक्ति को सत्य और न्याय का मापदंड बनाया जा रहा है। उन्होंने अफसोस व्यक्त करते हुए कहा कि पहले कहा जाता था 'ज्ञान ही शक्ति है', लेकिन आज व्यावहारिक रूप से यह अवधारणा बनाई जा रही है कि 'शक्ति ही ज्ञान है'। यह परिवर्तन न केवल ज्ञान बल्कि लोकतंत्र, सभ्यता और मानव स्वतंत्रता के लिए भी गंभीर खतरा है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान का भविष्य इस बात से जुड़ा हुआ है कि दुनिया में लोकतंत्र, सहिष्णुता, आलोचनात्मक विचार और सांस्कृतिक मूल्य किस हद तक संरक्षित रहते हैं। यदि प्रश्न पूछने, असहमति व्यक्त करने और स्वतंत्र रूप से सोचने की परंपरा कमजोर हो जाती है तो ज्ञान भी अपनी रचनात्मक शक्ति खो देगा। ज्ञान केवल विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों या पुस्तकालयों में नहीं पैदा होता है, बल्कि समाज के निचले स्तर, सार्वजनिक अनुभव और दैनिक जीवन के अवलोकन से भी इसका निर्माण होता है।
अपने भाषण में उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता निश्चित रूप से ज्ञान के अधिग्रहण को आसान बना रही है, लेकिन एआई मानव चेतना, भावना, नैतिक जिम्मेदारी और रचनात्मक दृष्टि का विकल्प नहीं बन सकती। मशीन जानकारी प्रदान कर सकती है, लेकिन ज्ञान, दृष्टि और न्याय उत्पन्न नहीं कर सकती। यही कारण है कि मनुष्य को अपनी आलोचनात्मक क्षमता और बौद्धिक स्वतंत्रता को हर हाल में संरक्षित रखना होगा।
उन्होंने आगे कहा कि जब ज्ञान में हास्य, प्रश्न और आत्म-विश्लेषण समाप्त हो जाते हैं, तो वह स्थिरता का शिकार हो जाता है। ज्ञान और न्याय का संबंध अनिवार्य है क्योंकि न्याय ज्ञान के बिना अंधा और ज्ञान न्याय के बिना उद्देश्यहीन हो जाता है। आज यदि समाज में सतही जानकारी को ज्ञान का नाम दिया जा रहा है, तो इसका परिणाम अज्ञानता, पूर्वाग्रह और बौद्धिक दासता के रूप में सामने आएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इतिहास गवाह है कि हर युग की सरकारें स्वतंत्र विचार और वास्तविक ज्ञान से डरती रही हैं क्योंकि जागरूक मानव को गुलाम बनाना आसान नहीं होता।
कार्यक्रम की शुरुआत में प्रमुख उर्दू और हिंदी विद्वान प्रोफेसर सफदर इमाम कादरी ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि 'ज्ञान का भविष्य' वर्तमान युग का सबसे महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि दुनिया तेजी से डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर रही है। उन्होंने प्रोफेसर शंभूनाथ की विद्वता सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी सोच नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है और उनके विचार वर्तमान युग के बौद्धिक संकट को समझने में मदद करते हैं।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए बिहार सरकार के पूर्व मुख्य सचिव श्री त्रिपुरारी शरण