अहमद अफ्ताब अंसारी देश के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसे दौर आते हैं जब सत्ता की प्राथमिकताएं राष्ट्र की वास्तविक समस्याओं से कटकर केवल प्रतीकों, नारों और नामों के इर्द-गिर्द घूमने लगती हैं। वर्तमान समय की राजनीति भी कुछ इसी तरह की स्थिति से गुजर रही है। जब एक ओर जनता महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक अनिश्चितता और सामाजिक अशांति के बोझ तले दबी हुई है, ऐसे में यदि सत्ता के गलियारों में सबसे अधिक ऊर्जा नामों के परिवर्तन और प्रतीकात्मक निर्णयों पर खर्च होने लगती है, तो यह सवाल अनिवार्य हो जाता है कि आखिर राज्य की वास्तविक जिम्मेदारी क्या है और शासन का उद्देश्य किस दिशा में बढ़ रहा है? आज देश जिन गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, वे किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। दैनिक आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं, किसान कर्ज और निराशा के दलदल में फंसते जा रहे हैं, बड़े शहरों में प्रदूषण जीवन को निगल रहा है, महिलाओं के खिलाफ अपराध समाज के चेहरे पर बदनामी का दाग बन चुके हैं और व्यवस्था की कमजोरी सामान्य नागरिक के सुरक्षा की भावना को आहत कर रही है। वैश्विक स्तर पर विदेश नीति के मोर्चे पर भी कई सवाल उठ रहे हैं, पड़ोसी देशों के साथ संबंध हों या बड़ी शक्तियों के साथ कूटनीतिक संतुलन हर जगह जटिलताएं स्पष्ट हैं। इस पृष्ठभूमि में, यदि राजनीति का केंद्र जनता की समस्याओं के समाधान के बजाय नामों के परिवर्तन पर केंद्रित हो जाए, तो इसे केवल संयोग नहीं कहा जा सकता। वास्तव में, यह एक विचार, एक सिद्धांत और एक विशिष्ट राजनीतिक रणनीति का प्रतीक है। पिछले कुछ वर्षों में, देश ने यह दृश्य बार-बार देखा है कि शहरों, सड़कों, चौराहों और संस्थानों के प्राचीन नाम बदल दिए गए हैं। इतिहास के पन्नों से कुछ युग और पात्रों को या तो मिटाने की कोशिश की गई या उन्हें एकपक्षीय तरीके से प्रस्तुत किया गया। पाठ्य पुस्तकों में संशोधन के नाम पर सदियों की साझा विरासत को सीमित व्याख्या में समेट दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया को राष्ट्र की पहचान की पुनर्प्राप्ति का नाम दिया गया, लेकिन वास्तव में इसके पीछे नफरत और विभाजन की राजनीति कार्यरत रही। अब यह क्रम एक ऐसे नाम तक पहुंच गया है जो न केवल इतिहास है बल्कि भारत की आत्मा, इसके नैतिक आधार और संवैधानिक पहचान का प्रतीक है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम किसी व्यक्ति या दल की जागीर नहीं है बल्कि पूरे देश की साझा अमानत है। उनके नाम से जुड़ा ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं है बल्कि राज्य की उस जिम्मेदारी का प्रकटीकरण है जो वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के प्रति स्वीकार करती है। इस कानून के नाम को बदलने या गांधी के नाम को अलग करने की कोशिश वास्तव में गांधी के राज्य की अवधारणा से विचलन है। वह अवधारणा जिसमें राज्य का काम कमजोर को सहारा देना, समाज में संतुलन बनाए रखना और असहमति के बावजूद सामंजस्य को बढ़ावा देना है। वर्तमान शासक वर्ग की राजनीति में गांधी एक औपचारिक प्रतीक हो सकते हैं लेकिन व्यावहारिक स्तर पर उनके विचारों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसके विपरीत, हिंसा, नफरत और विभाजन पर आधारित व्याख्या अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत हो रही है जो देश की आत्मा के लिए एक खतरनाक संकेत है। यही कारण है कि इस मामले पर देश की सेक्युलर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और गांधी के विचारों से जुड़े वर्गों में बेचैनी देखी जा रही है। विपक्ष की ओर से विरोध और सार्वजनिक स्तर पर प्रतिरोध इस बात का प्रकटीकरण है कि यह लड़ाई किसी एक कानून या नाम की नहीं बल्कि देश के वैचारिक भविष्य की है। संसद से लेकर सड़कों तक आवाज उठना इस चिंता की ओर संकेत करता है कि यदि आज गांधी के नाम को हटाना आसान बना दिया गया तो कल संवैधानिक मूल्य और लोकतांत्रिक परंपराएं भी इसी तरह नजरअंदाज की जा सकती हैं। असली दुर्भाग्य यह है कि जनता की वास्तविक समस्याएं पृष्ठभूमि में चली गईं और राजनीति का केंद्रीय व्याख्या ऐसे विषयों के इर्द-गिर्द घूम रही है जो न तो भूख मिटाते हैं, न रोजगार देते हैं और न ही किसान या मजदूर के जीवन में कोई सुधार लाते हैं। नामों की राजनीति अल्पकालिक रूप से भावनाओं को भड़का सकती है लेकिन यह देश के आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संकट का समाधान नहीं बन सकती। यदि यही रुझान जारी रहता है तो इसके परिणाम अत्यंत गंभीर होंगे। सेक्युलर परंपरा कमजोर पड़ेगी, संवैधानिक संतुलन बिगड़ेगा और वह भारत जिसकी पहचान विविधता, सहिष्णुता और साझा संस्कृति थी, धीरे-धीरे एक संकीर्ण दृष्टिकोण में बंद हो जाएगा। इस नुकसान की कीमत न केवल आज की पीढ़ी बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी चुकाएंगी। इसलिए आवश्यक है