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एसआईआर : संतोषजनक जवाब देने वाला कोई नहीं!!
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एसआईआर : संतोषजनक जवाब देने वाला कोई नहीं!!

Awaz E Bihar•10 दिसंबर 2025 को 01:01 pm बजे•2 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

लेखक: जावेद भारती
भारत के बारह राज्यों में एसआईआर लागू किया गया चार नवंबर से फॉर्म बांटा जाने लगा और भरा जाने लगा, बड़ी संख्या में बीएलओ की तैनाती की गई, बड़ी संख्या में बीएलओ ऐसे भी देखे गए जो खुद एसआईआर के बारे में कुछ नहीं जानते, ऐसे भी बीएलओ देखे गए जो अपने हाथों से फॉर्म भर नहीं पाते। आज भी हर तरफ अफरातफरी का माहौल है, कोई 2025 की वोटर सूची में अपना नाम ढूंढ रहा है तो कोई अपने पिता, दादा, नाना, नानी का नाम ढूंढ रहा है, तो कोई अपनी पत्नी का नाम ढूंढ रहा है, कोई अपने बेटे और बेटी का नाम ढूंढ रहा है और जब नहीं मिलता है तो चेहरा फीका पड़ जाता है, माथे पर चिंता की लकीरें उभर जाती हैं, फिर वह हर एक से सवाल पूछता है कि मेरा क्या होगा, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब देने वाला कोई नहीं मिलता।

इसी तरह बहुत बड़ी संख्या ऐसी देखी गई कि उनका नाम 2003 में है लेकिन उनके सरपरस्त का नाम नहीं है, वे भी काफी फिक्रमंद हैं। आज हर व्यक्ति अपने पूर्वजों का नाम ढूंढ रहा है और उन्हें याद कर रहा है। कहा जाता है कि यह केवल वोटर सूची की समीक्षा अभियान है ताकि साफ-सुथरी वोटर सूची तैयार की जा सके, लेकिन लोगों को यह टिप्पणी करते देखा जाता है कि जब मामला वोटर सूची का है तो इतने दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं और इतनी जल्दबाजी क्यों की गई और इतना कम समय क्यों दिया गया, जबकि सरकार भी जानती है और चुनाव आयोग को भी पता है कि देश में बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो लिखना-पढ़ना नहीं जानती।

दूसरी बात यह है कि जब एसआईआर, वोटर सूची की समीक्षा है तो फिर चुनाव आयोग यह क्यों कहता है कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है, मतलब जो बात सरकार को कहनी चाहिए वह बात चुनाव आयोग कह रहा है। इसी वजह से कुछ लोग कह रहे हैं कि मौजूदा एसआईआर वास्तव में छोटी एनआरसी है और चुनाव आयोग के माध्यम से कराई जा रही है।

विपक्षी दल एसआईआर को वोट चोरी का तरीका बता रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस मुद्दे पर राजनीति की रोटी भी सेंकी जा रही है। जनस्तर पर जो बेचैनी है उस बेचैनी को दूर करने के लिए कोई राजनीतिक दल मैदान में नहीं आया, जबकि होना तो यह चाहिए था कि सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्ष अपने कार्यकर्ताओं को कहते कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जनता का एसआईआर फॉर्म भरवाएं, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। एसआईआर में मांगी गई जानकारी सही तरीके से भरवाना और जनता को जागरूक करना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी थी ताकि किसी भी व्यक्ति का नाम वोटर सूची से कट न जाए।

वकीलों और विद्वानों का कहना है कि मौजूदा एसआईआर अतीत के एसआईआर से बिल्कुल अलग है, यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला है जो देश की जनता के लिए पूरी तरह से परेशान करने वाला है। आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा की जा रही है कि जिसके जिम्मे काम दिया जा रहा है वह आत्महत्या कर रहा है? यही वजह है कि बहुत से लोग चुनाव आयोग को घासबोस के रूप में देख रहे हैं। बहुत से वरिष्ठ वकील कहते हैं कि चुनाव आयोग को नागरिकता की जांच कराने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन फिर भी चुनाव आयोग ने ऐसा कदम उठाया कि देश का गरीब, मजदूर, कमजोर और दुर्बल वर्ग डरा हुआ है और इस वजह से मौजूदा चुनाव आयोग जनसमर्थन से वंचित है।

एसआईआर से संबंधित विपक्षी दलों ने भी सख्त रुख नहीं अपनाया, बस कोरम पूरा करने वाला तरीका अपनाया। यदि वे एक आवाज में कहते कि हम एसआईआर का बहिष्कार करते हैं और जब तक मौजूदा तरीके वाला एसआईआर रद्द नहीं होता तब तक हम संसद में नहीं आएंगे, लेकिन विपक्षी दलों ने ऐसा नहीं किया। उन्हें भी केवल जनता का वोट चाहिए।

जनता वोट इसलिए देती है ताकि जो सरकार बने वह जनता के लिए सुखद काम करे और विपक्ष जागरूक प्रहरी का काम करे। लेकिन 2014 से केंद्र सरकार ने देश की जनता को उलझा कर रखा है, छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयां बर्बाद होती जा रही हैं, बेरोजगारी और बेकारी बढ़ रही है, और जब कहीं चुनाव होता है तो भावनात्मक नारे लगाए जाते हैं, धार्मिक कार्ड खेले जाते हैं, नतीजा यह होता है कि बेरोजगारी और बेकारी के मुद्दे गुम हो जाते हैं। काश अब से सरकार देश की जनता को सुकून और संतुष्टि के साथ जीवन जीने का तरीका अपनाए, जो भी कानून बनाए वह आसान हो, जनता को आसानी से इसका पूरा लाभ मिले, और छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयों को बढ़ावा मिले।
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