न्यायमूर्ति वर्मा के बारे में जांच समिति की रिपोर्ट संसद में पेश, सभी आरोप सही पाए गए
Awaz E Bihar••28 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना के दौरान नकदी मिलने से संबंधित मामले की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को सही ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता में न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के तहत गठित जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश की गई। समिति के अन्य दो सदस्य बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्रीचंद्र शेखर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य हैं। दो खंडों में यह रिपोर्ट दोनों सदनों में क्रमशः लोकसभा और राज्यसभा के महासचिवों द्वारा पेश की गई। यह जांच रिपोर्ट 14 मार्च 2025 की रात जस्टिस वर्मा के तुगलक क्रेसेंट, दिल्ली में स्थित सरकारी आवास में आग लगने की घटना के दौरान 500 रुपये के जले हुए, आधे जले और गीले नोटों की गाड़ी मिलने से संबंधित है।
जांच समिति ने रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से बेहिसाब नकदी मिली जिसका स्रोत वे संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। समिति ने पाया कि उन्होंने साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की और जांच के दौरान प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं दिए। इस घटना की जांच शुरू होने के बाद उन्हें अप्रैल में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया था। न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए 200 से अधिक सांसदों ने पिछले साल मानसून सत्र में लोकसभा अध्यक्ष को प्रस्ताव पेश किया था। इसके बाद अध्यक्ष ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की थी।
जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि जिस स्टोर रूम में आग लगी थी उसका उपयोग फर्नीचर, बोतलें, क्राकरी आदि जैसी अनुपयोगी वस्तुओं के लिए किया जा रहा था और यह मुख्य आवास से जुड़ा हुआ नहीं था। उन्होंने कहा था कि वे और उनकी पत्नी घटना के समय आवास पर मौजूद नहीं थे और आग बुझने के बाद उनके परिवार या स्टाफ के किसी सदस्य की ओर से कोई नकदी या मुद्रा नोट नहीं देखे गए थे। उन्होंने कहा था कि उनकी ओर से या उनके परिवार के किसी सदस्य की ओर से वहां कोई नकदी नहीं रखी गई थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें दिखाए गए सामग्री से साजिश का संदेह होता है। बाद में इस विवाद के बढ़ने पर जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।