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वोट की गरिमा और राष्ट्र का भविष्य: निर्णायक क्षण और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी
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वोट की गरिमा और राष्ट्र का भविष्य: निर्णायक क्षण और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

Awaz E Bihar•7 अप्रैल 2026 को 01:44 pm बजे•12 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

डॉ. सैयद तबिश इमाम
संपर्क: 9934933992
देश का लोकतांत्रिक माहौल इस समय एक बहुत ही महत्वपूर्ण और नाजुक दौर से गुजर रहा है। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी जैसे पांच महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनावों की गतिविधियां अपने चरम पर हैं। हर तरफ रैलियों, जुलूसों, रैलियों, वादों और नारों की गूंज सुनाई दे रही है। प्रतीत होता है कि यह दृश्य लोकतंत्र की सुंदरता और इसकी सक्रियता को दर्शाता है, लेकिन अगर इस पूरी प्रक्रिया का गंभीर और निष्पक्ष रूप से विश्लेषण किया जाए तो इसके भीतर कई ऐसे पहलू भी छिपे हैं जो न केवल चिंता का कारण हैं बल्कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए भी प्रश्नचिन्ह खड़े करते हैं।

यह वह समय है जब एक जागरूक नागरिक की जिम्मेदारी केवल वोट देने तक सीमित नहीं रहती बल्कि उसे परिस्थितियों और तथ्यों का गहराई से विश्लेषण करते हुए अपने निर्णय की दिशा तय करनी होती है। पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव चरणबद्ध तरीके से आयोजित किए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल और असम में दो चरणों में मतदान होगा, जबकि तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी में एक ही चरण में मतदान होगा। चुनाव आयोग के घोषणा के अनुसार मतदान की प्रक्रिया अप्रैल के पहले सप्ताह से शुरू होकर महीने के अंत तक जारी रहेगी और परिणामों की घोषणा मई के पहले सप्ताह में की जाएगी।

प्रतीत होता है कि यह चरणबद्ध प्रणाली प्रशासनिक सुविधा और सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपनाई जा रही है, लेकिन इसके साथ ही यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इससे राजनीतिक दलों को लंबे चुनावी अभियान चलाने और जनमत को प्रभावित करने के लिए अधिक समय और अवसर मिलते हैं, जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव होते हैं।

यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि देश की चुनावी राजनीति पिछले कुछ वर्षों में एक उल्लेखनीय परिवर्तन से गुजरी है। अतीत में जहां विकास परियोजनाएं, सार्वजनिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं जैसे मुद्दे चुनावी अभियान का केंद्र बिंदु होते थे, वहीं अब धर्म, पहचान, भावनात्मक नारों और सांप्रदायिक रेखाओं पर आधारित कथन अधिक प्रभावी दिखाई देता है। इस परिवर्तन ने न केवल राजनीतिक वार्ता के मानक को प्रभावित किया है बल्कि सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के लिए भी खतरे पैदा किए हैं।

इन चुनावों में भी यही प्रवृत्ति पूरी तीव्रता के साथ महसूस की जा रही है। सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगी दल शक्ति प्राप्ति के लिए हर संभव रणनीति अपना रहे हैं। इन रणनीतियों में एक महत्वपूर्ण तत्व वह कथन है जो समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने का प्रयास करता है। नफरत भरे भाषण, उत्तेजक बयान, और विशिष्ट वर्गों के खिलाफ संदेह पैदा करने के लिए संगठित अभियान इस श्रृंखला की कड़ियाँ हैं। यह राजनीति का तरीका न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है बल्कि देश के सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करने का कारण बन रहा है।

विशेष रूप से मुस्लिम वोटों को बिखेरने के संगठित प्रयास लंबे समय से जारी हैं और इस बार भी इसमें कोई कमी नहीं दिखाई देती। इस उद्देश्य के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाए जाते हैं। कहीं नई राजनीतिक दलों को मैदान में उतारा जाता है, कहीं स्वतंत्र उम्मीदवारों को खड़ा किया जाता है, और कहीं धार्मिक भावनाओं को भड़काकर मतदाताओं को गुमराह करने का प्रयास किया जाता है। इन सभी कदमों का मूल उद्देश्य एक ही होता है कि एक संगठित और प्रभावी वोट बैंक को विभाजित कर उसे अप्रभावी बना दिया जाए ताकि चुनावी परिणामों पर प्रभाव डाला जा सके।

यहाँ यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि वे दल जो खुद को किसी विशिष्ट वर्ग, विशेष रूप से मुसलमानों के प्रतिनिधि और हितैषी दर्शाते हैं, उनकी वास्तविक भूमिका क्या है? अनुभव बताता है कि ऐसे कई दल भावनात्मक नारों और उच्च दावों के माध्यम से जनता को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से उनकी उपस्थिति वोटों के विभाजन का कारण बनती है। इस प्रकार वे सीधे या परोक्ष रूप से उन शक्तियों को लाभ पहुँचाते हैं जो सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं।

ऐसे हालात में सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता, विशेष रूप से सेक्युलर मतदाताओं पर आती है कि वे भावनाओं के बजाय बुद्धिमत्ता और जागरूकता से काम लें। अस्थायी नारों, धार्मिक भावनाओं और खोखले वादों के प्रभाव में आकर वोट देना वास्तव में अपने भविष्य को दांव पर लगाने के समान है। एक जागरूक मतदाता वही होता है जो जमीनी हकीकत, उम्मीदवार की प्रतिष्ठा, पार्टी की नीतियों और अतीत के प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय लेता है।

यह भी आवश्यक है कि हम लोकतंत्र की असली भावना को समझें। लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं बल्कि यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसमें जनता की जागरूकता, भागीद
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