कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी शख्सियत महज शारीरिक उपस्थिति तक सीमित नहीं रहती बल्कि आत्मा और दिमाग के कई पहलुओं पर छा जाती है। अनवर जलालपुरी मेरे लिए भी ऐसी ही हस्ती थे। कभी आमने-सामने मुलाकात का शرف नहीं हुआ, लेकिन उनके बेशुमार मुशायरों की वीडियोज देखकर महसूस होता रहा कि यह शख्स महज शायर या नाजिम नहीं बल्कि तहजीब, फहम, दानिश, मोहब्बत और इंसानियत का जीवंत आईना था। उनकी नाजिमी में वकार, शाइस्तगी और मोहब्बत की रोशनी वاضह थी, और उनकी आवाज में वह नरमी और ठहराव था जो दिल को فورन अपनी ओर खींच लेता।
६ जुलाई १९४७ को जलालपुर, जिला अम्बेडकर नगर में पैदा हुए अनवर अहमद ने तालीम के जरिए इल्म का चिराग हासिल किया और फहम और दानिश के जरिए तहजीब का तर्जुमान बनने का मुकाम हासिल किया। गोरखपुर यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और अवध यूनिवर्सिटी के इल्मी सफर ने उन्हें महज अदबी शख्सियत नहीं बल्कि फिक्र, तालीम और तहजीबी हमअहंगी का मुम्ताज नुमाइंदा बना दिया। वह उर्दू अदब, तालीम, तर्जुमा और तहजीब के संगम के नुमाइंदे थे।
अनवर जलालपुरी की शायरी में मोहब्बत, इंसानियत, खुद्दारी और फिक्र का हुस्न अमتزाज है। यह शेर पढ़ते हुए महसूस होता है कि शायर अपने फन की बुलंदी से ज्यादा अपनी जिम्मेदारी बयान कर रहा है, यह शेर एक फनकार की अपनी बुलंदी और जिम्मेदारी के बीच तवाजुन की निशानदेही करता है, एक ऐसे शायर की सोच जो अपने अल्फाज को सल्तनत समझकर चलता है।
मैं एक शायर हूँ मेरा रुतबा नहीं किसी भी वजीर जैसा मगर मेरे फिक्र और फन का फैलाव तो है बरी सगीर जैसा यह सिर्फ फख्र नहीं है, यह फनकार की सच्ची खुद पहचान है। उन्होंने इक्तिदार के दरवाजे नहीं खटखटाए, मगर कुलूब की सल्तनत उनके कदमों में थी, और यही सब से बड़ी बादशाही है।
अनवर जलालपुरी का सबसे शानदार अदबी करामा भागवत गीता का उर्दू में मनzoom तर्जुमा है। ७०१ श्लोकों को १७६१ अशआर में ढालना महज जुबान दानी नहीं बल्कि तहजीबों के संगम की आली तस्वीर है। इसी काम के जरिए उन्होंने उर्दू अदब के साथ हिंदुस्तान की مشترका तहजीब को भी करीब किया। इसी फिक्र और खिदमत की बदौलत उन्हें यश भारती, इफ्तिखार-ए-मीर, उत्तर प्रदेश गौरव, समाजी एकता अवार्ड से नवाजा गया, और जिंदगी में पद्म श्री से भी सरफराज किया गया।
मुशायरों की दुनिया में वह महज नाजिम नहीं बल्कि एक जमीर थे। जब वह स्टेज सम्भालते, महफिलें महज मुशायरा नहीं रहतीं बल्कि तहजीबी जश्न में बदल जाती थीं। उनके अल्फाज में शाइस्तगी, मिजाज में वकार और लहजे में मिठास ऐसी थी जो सुनने वाले के दिल पर दीर्घकालिक असर छोड़ती थी।
वह न केवल देश भर में बल्कि विदेशों में भी उर्दू अदब और मुशायरों के जरिए अपनी रोशनी बिखेरते रहे। यूरोप, खाड़ी देशों और उत्तरी अमेरिका में उर्दू मुशायरों और अदबी महफिलों में उनकी शिरकत ने वहां के उर्दू अदब के शौकीनों को भी मोहब्बत, तहजीब और अदब से रोशनास कराया। उनकी नाजिमी में वह फहम, वकार और लताफत थी जो सिर्फ अदब की महफिल को नहीं बल्कि एक तहजीबी अनुभव को भी स्थानांतरित करती थी। उनका यह अंदाज देश और विदेश में सुनने वालों के दिलों में दीर्घकालिक असर छोड़ गया।
जब वह इंसानियत, मोहब्बत और मजहबी रवादारी की बात करते तो दिलों के बीच फासले خود-ब-खुद घुल जाते। यह शेर मोहब्बत और तहजीबी एकता की अहमियत को उजागर करता है, यह शेर मजहबी रवादारी के साथ इंसानी रिश्तों के लिए जिम्मेदारी सिखाता है।
दोस्तों! अयार दुनिया की हिफाजत के लिए आब-ए-जम जम हो तो गंगा जल भी होना चाहिए यह सोच दिलों को करीब लाती है, इंसानियत की तरबियत देती है और अलग-अलग मजहबों और संस्कृतियों के बीच रिश्तों का पुल बनती है।
उनकी शायरी में जिंदगी के मुशाहिदे, सच्चाई की तल्खी और इंसान की कमजोरियों का गहरा एहसास भी शामिल है। दुनिया की सच्चाई को एक आईने की तरह देखने की दावत है।
कोई हारा, कोई जीता, खबर किस को है लोग तो महज तमाशे के लिए आए थे दुनिया एक भीड़ है जो तमाशा देखती और आगे बढ़ जाती है। यह शेर एहसास दिलाता है, तल्खी नहीं है, बल्कि हकीकत से रोशनास कराता है।
उनकी मजहबी वाबस्तगी भी उतनी ही मजबूत थी जितनी उनकी तहजीबी वुसअत। "राह-रू से रहनुमा तक" में खुलफा-ए-राशिदीन की मनzoom सीरत, "तोशा-ए-आखिरत" में पारा अम्द का मनzoom तर्जुमा और "ज़र्ब-ए-ला इलाह" में उनकी फिक्री झलकियां यह साबित करती हैं कि वह दीन को सीमित नहीं बल्कि खुलापन के तौर पर समझते थे। यह शेर उनकी शख्सियत, अखलाक और इंसानियत की तर्जुमानी करता ह