डॉक्टर सैयद फ़रहान ग़नी बाबरी मस्जिद की नींव 1528 में रखी गई। यह मस्जिद मुगल बादशाह बाबर के हुक्म पर बनाई गई और इसका मकसद मुसलमानों को इबादत के लिए एक जगह प्रदान करना था। कुछ लोगों का दावा है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण एक हिंदू मंदिर के ऊपर किया गया था, जो रामचन्द्र की जन्मभूमि (राम जन्मभूमि) पर स्थित था, तो भी इस दावे का कोई प्रमाणित ऐतिहासिक सबूत नहीं मिल सका। बाबरी मस्जिद का विवाद उस समय तेज हो गया जब 19वीं शताब्दी के अंत में हिंदू कट्टरपंथियों ने यह दावा करना शुरू किया कि मस्जिद का स्थान राम की जन्मभूमि है और इस स्थान पर एक मंदिर था जिसे मुगल शासकों ने तोड़ दिया था। इस दावे के बाद विभिन्न समूहों के बीच धार्मिक और राजनीतिक तनाव बढ़ता गया। 1949 में मस्जिद के अंदर एक विवाद उत्पन्न हुआ, जब कुछ हिंदू धार्मिक नेताओं ने दावा किया कि वहां राम की मूर्ति है। इस पर स्थानीय प्रशासन ने मस्जिद के दरवाजे बंद कर दिए। 1986 में बाबरी मस्जिद के दरवाजे फिर से खोले गए और हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी गई, जिसके बाद इस विवाद में तीव्रता आई। 6 दिसंबर 1992 को एक बड़ी संख्या में हिंदू कट्टरपंथियों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई से देश को व्यापक पैमाने पर विरोध और अशांति का सामना करना पड़ा। हजारों लोग इस हंगामे में शामिल हुए और मस्जिद को मलबे का ढेर बना दिया। इस घटना के बाद पूरे भारत में दंगे फैल गए, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों लोग घायल हुए। बाबरी मस्जिद का मामला भारत के इतिहास में एक गंभीर और संवेदनशील अध्याय है, जो धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से असंख्य जटिलताओं का वाहक है। यह मस्जिद भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के शहर अयोध्या में स्थित थी। बाबरी मस्जिद के संबंध में एक लंबे समय तक विवाद रहा जो अंततः 1992 में हिंदू आतंकवादियों के हवाले हो गया। इस प्रकार हिंदू आतंकवादियों ने इस ऐतिहासिक मस्जिद को शहीद कर दिया। बाबरी मस्जिद के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी गई जो कई दशकों तक चली। 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मस्जिद की जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जाए, जिसमें एक हिस्सा मुसलमानों को, एक हिस्सा हिंदुओं को और एक हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए, तो भी मुसलमानों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में फैसला सुनाया और कहा कि बाबरी मस्जिद की जमीन हिंदुओं को दी जाए और मुसलमानों को वैकल्पिक जमीन प्रदान की जाए। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि बाबरी मस्जिद को अवैध तरीके से तोड़ा गया और मंदिर को तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई थी, इसके बावजूद वहां पर मंदिर बनाने का निर्देश देना समझ से परे है। बाबरी मस्जिद के बहाने हिंदू राष्ट्रवादी दलों ने, विशेष रूप से भाजपा और संघ परिवार ने, राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से सार्वजनिक स्तर पर धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक उद्देश्यों के साथ जोड़ दिया। यह आंदोलन पूरे भारत में जलूसों, रैलियों और यात्राओं के माध्यम से फैलाया गया। राम रथ यात्रा का नेतृत्व एलके अडवाणी ने किया था, जो आज गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का किरदार अत्यंत महत्वपूर्ण था। कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को लिखित आश्वासन दिया था कि बाबरी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। कारसेवकों को हद से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा। राज्य में शांति और सुरक्षा बनी रहेगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कल्याण सिंह ने जानबूझकर प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी से रोका। इसलिए प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए। लगभग डेढ़ लाख कारसेवकों द्वारा सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। आजादी के बाद पहले आतंकवादी हमले में गांधी जी की हत्या हुई और दूसरे आतंकवादी हमले में बाबरी मस्जिद शहीद हुई। लाखों कारसेवक अयोध्या में जमा हुए, प्रशासन लाचार रहा और कुछ घंटों में मस्जिद शहीद कर दी गई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह घटना केवल धार्मिक नहीं बल्कि अत्यधिक संगठित राजनीतिक आंदोलन का परिणाम थी। जिसके कारण सांप्रदायिक राजनीति मजबूत हुई। नफरतों में वृद्धि हुई। वोट बैंक के आधार में परिवर्तन आया। धर्म और राजनीति का मेल अधिक गहरा हो गया। इस संगठित राजनीतिक आंदोलन ने लाखों लोगों को एक भावनात्मक धार्मिक अभियान के माध्यम से प्रेरित किया। इस घटना ने दोनों समुदायों में अविश्वास बढ़ाया और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित किया। अल्पसंख्यकों के सुरक्षा की भावना में वृद्धि हुई। जब से भाजपा की सरकार आई है, तब से मुसलमानों पर अत्याचार बढ़े हैं। सरकार का उद्देश्य भी यही है कि हिंदू मुसलमान से नफरत करें। बहुसंख्यक वर्ग के दिमाग में मुसलमानों के खिलाफ जहर घोला जा रहा है। यही कारण है कि हिंदू समाज में उग्रवादी तत्व अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने को हवा देते हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और स्वतंत्रता प्रभावित होती है। अब तो राजनीतिक स्तर पर भी अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कम होता जा रहा है, जो अत्यंत खतरनाक है। यद्यपि संविधान और कानून धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसा कुछ होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सांप्रदायिक ताकतें इतनी मजबूत हो गई हैं कि वे देश के सेक्युलरिज्म का गला घोंट रही हैं। अब तो मुसलमान यह सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है। क्योंकि उन्हें विकास के समान अवसरों से भी वंचित किया जा रहा है। बाबरी मस्जिद का विवाद न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, बल्कि यह भारत के सामाजिक ताने-बाने पर भी गहरे प्रभाव डालता था। इस विवाद ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया और राष्ट्र को कई दशकों तक विभाजित किया। इन दंगों के परिणामस्वरूप सामाजिक सौहार्द को गंभीर क्षति पहुंची और देश में असंख्य जानें गईं। बाबरी मस्जिद का विवाद एक गंभीर उदाहरण है कि कैसे धार्मिक विश्वास और राजनीति के मेल से सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। इससे हमें यह सीखने को मिलता है कि देश के भीतर धार्मिक सहिष्णुता और सौहार्द को बढ़ावा देना कितना आवश्यक है। इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि इतिहास के विवादों का समाधान केवल अदालतों और कानून के माध्यम से नहीं किया जा सकता है, बल्कि सार्वजनिक स्तर पर सौहार्द और समझौते की आवश्यकता होती है।