लेखक: डॉ. सैयद तबिश इमाम संपर्क: 9934933992 जब कोई समाज अपने ही संविधान, अपने सामूहिक विवेक और अपने मानवीय मूल्यों से डर जाता है, तो वहां सबसे पहले सच की नहीं, बल्कि मानवता की हत्या होती है। ऐसे समाज में अत्याचार के खिलाफ खड़े होना और पीड़ित के साथ खड़े होना अपराध बन जाता है। नैतिक साहस, मानवीय सहानुभूति और नागरिक कर्तव्य केवल पुस्तकीय परिभाषाएं रह जाती हैं, जबकि शक्ति, भीड़ और बहुसंख्यक भावनाएं कानून की नई परिभाषा तय करने लगती हैं। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक और संवैधानिक लोकतांत्रिक देश में यह स्थिति केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक आत्म-मूल्यांकन की मांग करती है।
उत्तराखंड के कोटद्वार में हाल ही में घटित घटना इसी संवैधानिक और नैतिक पतन का एक दर्दनाक उदाहरण है, जहां एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यापारी की रक्षा में खड़े होना एक युवा हिंदू नागरिक, दीपक, के लिए अपराध बन गया। यह घटना किसी एक व्यक्ति या शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस भारत के विचार पर प्रश्नचिन्ह है जो संविधान, न्याय और मानव गरिमा के आधार पर स्थापित हुआ था।
दीपक का अपराध महज इतना था कि उन्होंने भीड़ की हिंसा के सामने सर झुकाने से इनकार कर दिया। उन्होंने धर्म, पहचान और बहुसंख्यक दबाव से ऊपर उठकर एक बेबस انسان का साथ दिया। वह क्षण महज एक व्यक्ति की प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि यह सामूहिक नैतिकता का परीक्षण था जिस पर किसी भी सभ्य समाज की नींव रखी जाती है। दीपक ने इस परीक्षण में सफलता प्राप्त की, मगर दुर्भाग्य यह है कि इसी सफलता को उनके लिए अपराध बना दिया गया।
यह वह बिंदु है जहां राज्य और नागरिक के बीच अंतर स्पष्ट होता है। एक ओर वह नागरिक है जो संविधान की भावना के अनुसार मानवता को प्राथमिकता देता है, और दूसरी ओर वह राज्य तंत्र है जो शक्तिशाली भीड़ के दबाव में आकर मानवता के रक्षक को ही कानून के कटघरे में खड़ा कर देता है। यह वह क्षण है जहां फासीवादी मानसिकता बेनकाब होती है—वह मानसिकता जो विवेक की आवाज से डरती है और नैतिक साहस को अपने लिए खतरा समझती है।
कानूनी शिकंजा और नागरिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन दीपक के खिलाफ गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई, जिनकी प्रकृति और कानूनी आधार अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाए हैं। न तो कोई ठोस घटना सामने आई, न ऐसे साक्ष्य जिनके आधार पर सख्त कानूनी कार्रवाई को सही ठहराया जा सके। इसके बावजूद कानून को गति में लाया गया, मानो उद्देश्य न्याय प्रदान करना नहीं, बल्कि एक उदाहरण प्रस्तुत करना हो—ताकि आगे कोई नागरिक भीड़ के सामने खड़े होने की हिम्मत न करे।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि दीपक की व्यावसायिक गतिविधियों और आवाजाही को सार्वजनिक रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया। यह शक्ति का वह शांत और बेनाम उपयोग है जो संविधान के अनुच्छेद 19 में दी गई नागरिक स्वतंत्रताओं—वाक स्वतंत्रता, व्यावसायिक स्वतंत्रता और आवाजाही की स्वतंत्रता—का स्पष्ट उल्लंघन है। संविधान का अनुच्छेद 19 महज एक कानूनी धारा नहीं, बल्कि नागरिक गरिमा की गारंटी है। यह हर भारतीय को यह अधिकार देता है कि वह बिना डरे बोल सके, काम कर सके और जीवन जी सके। मगर कोटद्वार की घटना यह सवाल खड़ा करती है कि क्या ये स्वतंत्रताएं अब केवल कागजी प्रावधान बनकर रह गई हैं? क्या उनका प्रयोग तब तक मान्य है जब तक वे बहुसंख्यक भावनाओं से तालमेल बिठाती हैं? अगर ऐसा है तो लोकतंत्र और संवैधानिक राज्य के सभी दावे महज एक धोखा बन जाते हैं।
डर का साया: जब परिवार भी सजा भुगतता है दीपक के खिलाफ कार्रवाई महज एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रही। इसकी कीमत उनके पूरे परिवार को चुकानी पड़ रही है। संघ परिवार संगठनों की कथित अवैध गतिविधियों और लगातार उत्पीड़न ने ऐसा माहौल बना दिया है कि दीपक का घर डर के घेरे में आ गया है। खबरों के अनुसार उनकी बेटी ने स्कूल जाना बंद कर दिया है। यह खबर महज एक घरेलू समस्या नहीं, बल्कि एक राज्य की विफलता का घोषणा है।
अगर एक नागरिक को संवैधानिक कर्तव्य निभाने की सजा मिले कि उसका बच्चा डर के कारण शिक्षा से वंचित हो जाए, तो फिर सवाल यह है कि राज्य आखिर किसके हितों की रक्षा कर रहा है? भारत का संविधान न केवल जान और माल की सुरक्षा की गारंटी देता है, बल्कि नैतिक साहस, परस्पर सहानुभूति और मानव गरिमा की रक्षा को भी अपना मूल उद्देश्य बनाता है। कोटद्वार की घटना इस संवैधानिक भावना के बिल्कुल विपरीत खड़ी नजर आती है, जहां भीड़ को खुश रखने के लिए कानून को हथियार बना दिया गया है।
यह वह बिंदु है जहां राज्य की भूमिका महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक भी होती है। राज्य का कर्तव्य है कि वह कमजोर नागरिक को शक्तिशाली भीड़ से बचाए, न कि भीड़ की नाराजगी से बचने के लिए नागरिक को बलि का बकरा बना दे।