लोकतंत्र का अर्थ अक्सर केवल इतना समझ लिया जाता है कि जनता अपने शासक स्वयं चुने। जबकि वास्तविकता यह है कि लोकतंत्र का असली परीक्षण चुनाव के बाद शुरू होता है। वोट डालना लोकतंत्र का पहला कदम है, लेकिन सरकार के गठन के बाद शक्ति का उपयोग कैसे किया जाता है, विपक्ष को कितना महत्व दिया जाता है और अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर वर्गों को न्याय मिलता है या नहीं, यह वे बातें हैं जो साबित करती हैं कि लोकतंत्र वास्तविक है या केवल औपचारिक रूप से लोकतंत्र का दिखावा है।
इस संदर्भ में, विपक्ष का नेता केवल एक पद नहीं है, बल्कि संवैधानिक संतुलन का प्रतीक है, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश के राजनीतिक माहौल में इसे अनावश्यक पद समझ लिया गया है। जबकि संविधान और संसदीय परंपराओं में इस पद का महत्व लगभग सरकार के बराबर है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि जिस पार्टी को या पार्टियों को बहुमत नहीं मिला, वे विपक्ष में हैं। यह अवधारणा लोकतंत्र की मूल समझ के विरुद्ध है। इसे इस तरह समझें: एक पार्टी ने केवल 37 प्रतिशत वोट प्राप्त किए, अधिक सीटें प्राप्त कीं और बहुमत में आ गई, जबकि विपक्षी पार्टियों ने 63 प्रतिशत वोट प्राप्त किए और वोटों के विभाजन के कारण कम सीटें प्राप्त कीं। इस प्रकार, शासक दल को केवल 37 प्रतिशत जनता का समर्थन प्राप्त है, और विपक्ष 63 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
एक बात जो अक्सर भूल जाती है कि हमारे संविधान ने स्पष्ट किया है कि देश को सरकार नहीं चलाती, बल्कि संसद चलाती है। प्रधानमंत्री, कैबिनेट, और नौकरशाही सभी संसद के सामने जवाबदेह हैं। संसद ही कानून बनाती है, बजट पारित करती है, नीतियों पर चर्चा करती है और सरकार के फैसलों को संवैधानिक रूप देती है। संसद का गठन लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति से होता है, और इनमें संतुलन बनाए रखने के लिए विपक्ष का मजबूत होना आवश्यक है। लोकतंत्र केवल बहुमत के शोर में नहीं बदलना चाहिए, बल्कि इतना संवेदनशील होना चाहिए कि विपक्ष की कमजोर से कमजोर आवाज भी सुनी जाए, यही लोकतंत्र का आधार है।
विपक्ष की जिम्मेदारी प्रश्न उठाना, चर्चा करना, आलोचना करना या संशोधन की मांग करना होती है। विपक्ष के नेता का यह केंद्रीय भूमिका होता है कि वह सरकार के फैसलों पर प्रश्न उठाए, बिलों की खामियों को गिनाए, और संशोधन पेश करे। वह उन वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है जिनकी आवाज़ सीधे सरकार तक नहीं पहुंचती है। संसदीय परंपराओं के अनुसार, संवैधानिक संस्थानों में नियुक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों, और संवेदनशील मामलों में विपक्ष के नेता को विश्वास में लेना आवश्यक समझा जाता रहा है।
लोकतंत्र में विपक्ष को दुश्मन समझना किसी भी सरकार के लिए उचित नहीं है। विपक्ष को सरकार का उत्तराधिकारी समझा जाना चाहिए। कहा जाता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जन संघ से पहली बार संसद के सदस्य चुने गए अटल बिहारी वाजपेयी का परिचय विश्व नेताओं से भारत के भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में कराया था। यह कोई राजनीतिक मजबूरी नहीं थी, बल्कि उनके लोकतांत्रिक स्वभाव का स्थिरता था।
पिछले एक दशक में भाजपा के नेतृत्व में केंद्र और राज्य सरकारों ने विपक्ष के विरोध को दरकिनार करते हुए कई कानून मनमाने तरीके से पारित किए हैं। इनमें से अधिकांश को बहुत जल्दबाजी में और बिना विस्तृत चर्चा के पारित किया गया है। इस तरह के कानूनों को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। नागरिकता संशोधन अधिनियम या सीएए विवादास्पद कानून बनकर सामने आया है, जिसमें नागरिकता को पहली बार धर्म से जोड़ा गया है। इस कानून के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन सरकार ने विरोध को सख्ती से कुचल दिया, कई प्रदर्शनकारी मारे गए।
एक और उदाहरण यूएपीए में संशोधन का है। इस कानून का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किए जाने के डर के कारण इसका जोरदार विरोध हुआ। 2020 में तीन कृषि कानून पारित किए गए। इन कानूनों के खिलाफ जनता और विपक्ष ने जोरदार विरोध किया। यह विरोध एक साल से अधिक समय तक जारी रहा। किसानों का यह विरोध आधुनिक भारत की सबसे बड़ी जन आंदोलन माना जाता है। केंद्र सरकार ने श्रमिकों के लिए श्रम संहिता में भी संसद में उचित चर्चा के बिना बदलाव किए हैं। इसका विपक्ष और ट्रेड यूनियनों ने जोरदार विरोध किया है और कहा है कि इससे श्रमिकों के अधिकार प्रभावित होंगे। लेकिन सरकार ने विरोध पर ध्यान नहीं दिया है।
इसी तरह, राज्य स्तर पर कानून बनाए गए, जैसे कि लव जिहाद, धर्म परिवर्तन जैसे कानून बनाए गए और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम और अन्य सख्त कानूनों का प्रयोग किया गया या उनका दायरा बढ़ाया गया। इन कानूनों के संबंध में कई आशंकाएं सही साबित हुई हैं, जैस