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खुशबू की शायरा परवीन शाकिर ने दिलबरी का पद संभाला
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खुशबू की शायरा परवीन शाकिर ने दिलबरी का पद संभाला

Awaz E Bihar•27 दिसंबर 2025 को 10:58 am बजे•1 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें

डॉक्टर शगुफ्ता यासमीन
वह खुशबू की तरह उर्दू साहित्य के चमनजार को महकाती हुई وارد हुईं और बड़ी तेजी के साथ अपनी शख्सियत के हुस्न और आत्मविश्वास, लब और लहजे की नरमी और शिरीनी और दिल में उतरने वाली शायरी के साथ ज़हन और दिल पर छा गईं। बहुत कम उम्र में उन्हें वह शोहरत और लोकप्रियता मिली जो बहुत कम खुशनसीब लोगों के हिस्से में आती है। यह मायानाज़ शख्सियत खुशबू की शायरा परवीन शाकिर हैं जिन्होंने नारीवादी जज्बात और एहसास को पूरी आब और ताब और सच्चाई के साथ कलम और कागज़ के सुपुर्द किया, यूं तो उनसे पहले भी अदा जाफरी और फहमीदा रियाज जैसी मज़बूत और ताकतवर आवाजें मौजूद थीं जो अपने अपने रंग और आहंग में शायरी कर रही थीं लेकिन परवीन शाकिर का इज्ज़त यह है कि उनकी शायरी में एक औरत के नारीवादी जज्बात और एहसास अपनी तमाम तरंगों के साथ मौजूद हैं।

परवीन शाकिर ने 24 नवंबर 1952 को काराची के एक साइंसी और अदबी घराने में आंखें खोलीं। उनके वालिद सैयद शाकिर हुसैन थाकब बहार के दरभंगा जिले के लहरिया सराय से ताल्लुक रखते थे और पाकिस्तान के कयाम के बाद काराची में आकर बस गए। परवीन शाकिर बहुत कम उम्र में ही शायरी करने लगी थीं और इसमें उनके वालिद की सरपरस्ती और हौसला अफजाई का भी दखल था जो खुद भी शायर थे और शाकिर तखल्लुस करते थे। परवीन ने मैट्रिक का इम्तिहान रजविया गर्ल्स स्कूल काराची से और बीए सर सैयद कॉलेज से पास किया। 1972 में काराची यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में एमए की डिग्री हासिल की और फिर लिंग्विस्टिक्स में भी एमए किया। इसके अलावा परवीन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स की डिग्री भी हासिल की। तालीम मुकम्मल करने के बाद अब्दुल्ला गर्ल्स कॉलेज काराची में असताज के तौर पर मुक़र्रर हुईं। इसके अलावा जामिया कॉलेज और ट्रिनिटी कॉलेज में 9 साल तक दारस-ओ-तद्रीस से वाबस्ता रहीं। पाकिस्तान सिविल सर्विसेज का इम्तिहान पास करने के बाद 1982 में काराची में सेकेंड सेक्रेटरी सेंट्रल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के ओहदे पर फायज हुईं। बाद में उन्होंने इस्लामाबाद में डिप्टी कलेक्टर के फराइज भी अंजाम दिए।

25 साल की उम्र में पहला मजमूआ-ए-कलाम 'खुशबू' मंज़र-ए-आम पर आया और अपनी खुशबू से अदबी हलकों में धूम मचा दी। इस मजमूए पर उन्हें आदम जी अवार्ड से नवाजा गया। 1982 में जब वे सीएसएस का इम्तिहान दे रही थीं तो उर्दू के सवालनामे में एक सवाल उनकी शायरी के मुताल्लिक था। यह परवीन शाकिर का अनोखा इज्ज़त था जिस पर वे तमाम उम्र फख्र करती रहीं। परवीन शाकिर का पहला मजमूआ-ए-कलाम 'खुशबू' उर्दू शायरी के चमन में एक ताजगी का मेहका जैसा था जिसने हर खास-ओ-आम को चौंका दिया। गो कि नारीवादी इज़हार-ए-बयान के पैराए अपने अपने रंग-ओ-आहंग में पहले से ही मौजूद थे लेकिन नारीवादी जज्बात और एहसास को पूरी तहजीबी पासदारी और नफासत-ओ-नजाकत के साथ बयान करने का हुनर उनकी शायरी के साथ ही दुनिया-ए-सुखन में وارد हुआ।

परवीन शाकिर की शायरी एक नवखिज़ लड़की के सत रंगे और कच्चे जज्बात से एक रफीका-ए-हयात, एक मां और एक पक्की उम्र की बाशऊर औरत के जीवन के मुख्तलिफ मरहलों का निगारखाना है। खुशबू की लड़की जिसके शहर-ए-जात में मोहब्बत की खुशबू दबे पाओं अंदर आती है जो इस कैफियत में मुब्तला है कि छुपाए नहीं छुपती और बताए नहीं बनती। जो तन्हाई में यह सोचकर कांप उठती है कि हाल-ए-दिल चेहरे से मुनकशिफ न हो जाए लेकिन ख्वाब टूटकर रेजा-ए-रेजा हो जाते हैं, दिल की गलियां सुनसान हैं और इसके नीम-वा-दरीचों में कई रुतों से एक ही मौसम ठहर सा गया है - सिर्फ इंतजार का मौसम। अजल से ही औरत के हिस्से में दरबदरी रही है। दुख-सुख, खुशी-गम, जबर-ओ-इख्तियार पर उसका कुछ बस नहीं चलता। वह मर्द की इजाजत की पाबंद है और जितनी इजाजत उसे मिलती है उसी लक्ष्मण रेखा के अंदर वह जीने और मरने की पाबंद है। इसी दायरे में वह गम की तारीकियों और खुशियों के اجाले से अपनी जिंदगी के कैनवस में गहरे हल्के रंग भरती है। यह बेइमानी और बेरदाई और हिज्र-ओ-फराक परवीन शाकिर के हिस्से में भी आया। कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने - बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की। लेकिन शब-ए-तन्हाई की कयामत को अपनी जात में समेटे महबूब को दुआ देने का हौसला परवीन शाकिर के यहां ही मिलता है - तेरा पेहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे, तुझ पर गुजरे न कयामत शब-ए-तन्हाई की। तन्हाई का कर्ब, सच बोलकर हार जाने का गम
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