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बदमजगी - मानवीय रिश्तों के लिए जहर कातिल
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बदमजगी - मानवीय रिश्तों के लिए जहर कातिल

Awaz E Bihar•4 दिसंबर 2025 को 12:29 pm बजे•6 व्यूज़•8 मिनट पढ़ें

मुफ्ती मुहम्मद सना उल हुदा कासमी उप नाजिम एमरात ए शरिया, पटना

अमीर ए शरीयत सादिस हजरत मौलाना सैयद निजामुद्दीन साहब फरमाया करते थे कि अगर आपकी योग्यता बहुत अच्छी हो, लेकिन आपका स्वभाव सही नहीं हो तो लोग आपसे दूर भागने लगेंगे, बिल्कुल उसी तरह जैसे कि गूमन सांप के लाल के हासिल करने का ख्वाहिशमंद हर आदमी होता है, लेकिन उसकी जो फुंकर होती है उससे डरकर आदमी उसके करीब नहीं जाता, उसी तरह बा सलाहियत इंसान की सलाहियतों से फायदा उठाने की ख्वाहिश होती है, लेकिन उसकी बदमजाजी, बेकाबू जुबान और बदअखलाकी की वजह से इंसान उससे दूरी बनाए रखने में आफियत समझता है, ताकि वह इज्जत नफ्स के साथ जी सके, जो लोग बदमजाजों से करीबत रखते हैं, वे कभी भी जिल्ल हो सकते हैं और उनमें बेगैरती के जरासिम तेजी से परवान चढ़ने लगते हैं।

मनोविज्ञान की जुबान में ऐसे लोगों को "टेक्सिक रवैया" का इंसान कहा जाता है, इस रवैये में सिर्फ बुरे तजुर्बे ही शामिल नहीं होते, कुछ ऐसे मामले भी होते हैं, जिन्हें आप मामूली समझकर गुजर जाते हैं, लेकिन वे आपके दिल के नहानखानों में जगह बना लेते हैं, تحتالشعور में दबी यह चंगारियां मायूसी और तनाव के शक्ल में बाहर आकर दूसरों को रुसवा करने का काम करती हैं, इसलिए ऐसे लोगों की पहचान करके उन्हें अपनी जिंदगी से निकाल देने में ही आफियत है। अगर आप ऐसे लोगों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाते रहते हैं तो इसका बुरा असर आपकी खुदاعتمादी पर पड़ता है, अगर आप किसी बात को सच समझते हैं तो उसे सच कहने का हौसला जुटाइए, हमेशा खामोश रहना मसले का हल नहीं होता, कई बार अहम मामलों पर अपनी राय रखना भी जरूरी होता है।

जैसा कि मालूम है बदमजाजी एक रवैया है, रवैया इंसानी शख्सियत का बयान होता है, ब्रिटेन के पूर्व वजीर ए आजम सरवंसन्ट चर्चिल (५६९१-४७९१) के मुताबिक रवैया एक मामूली सी चीज है, लेकिन इंसानी शख्सियत में इसकी बड़ी अहमियत है, रवैये का इन्हिसार बड़ी हद तक इंसान के अपने तर्ज ए फिक्र पर होता है, अगर वह तकब्बुर और तरफअ का शिकार है, "अना" का اسीर है तो इसके बदमजाज होने के इमकानात ज्यादा हैं, ऐसे लोग अपने रवैये पर काबू पाने में नाकाम होते हैं, वे अगर जुबान से कुछ न बोलें तो उनके चेहरे बोलने लगते हैं, उनकी बदमजाजी के آثار उनके चेहरे से जाहिर होने लगते हैं, ऐसे लोगों पर जज्बाती असर फौरी तौर पर गालिब आता है, उनकी शख्सियत की सब से बड़ी कमजोरी उनकी इन्फियलित होती है, ऐसा शख्स अखलाक व आदत के एतबार से मजबूत नहीं होता, अपना फायदा नज़र आए तो कुछ भी कर गुजरता है, इन्फियलित दरबार ए खुदावंदी में तो अच्छी चीज है, लेकिन बंदों की बारगाह में यह शख्सियत की कमजोरी को नुमाया करता है।

बदमजाजी एक मनفی रवैया है, इस रवैये का आदी शख्स दूसरों के कामों में खामियां निकालकर और तन्कीद करके नफ्सियाती तस्कीन हासिल करता है, बदमजाज आदमी का रवैया धमकी अमेज भी हो सकता है, वह आपको नुकसान पहुंचाने के दरपे भी हो सकता है, इसके बावजूद यह याद रखना चाहिए कि बदमजाजी फितरत नहीं है, जिसे बदला न जा सके, यह एक चाल चलन है, जिसे मुसबत रवैया और सही सोच के जरिए बदला जा सकता है, अपनी सोच को मुसबत और गैर जरूरी अंदेशों के खोल से बाहर लाइए, दूसरों का इकराम व इहतेराम कीजिए, उनकी बातों को गौर से सुनिए और जो सही हों उन्हें अहमियत दीजिए और उस पर अमल कीजिए, बदमजाजी खत्म हो जाएगी, लेकिन अगर कोई शख्स हिटलर और मुसोलिनी की तरह डिक्टेटर बनकर बदमजाजी खत्म करना चाहे तो यह नामुमकिन अमल है, इसका इलाज सिर्फ रवैयों में तब्दीली है। रवैये मुसबत होंगे तो बदमजाजी खत्म होगी, मनفی होंगे तो तब्दीली कभी नहीं आएगी, रवैयों की तब्दीली का यह काम बदमजाज शख्स खुद भी कर सकता है और बाहरी दबाव से भी बदमजाजी खत्म हो सकती है, यह बाहरी दबाव कई किस्म के हो सकते हैं, जिनका इंतिखाब हालात और माहौल के एतबार से किया जा सकता है, इनमें से एक यह है कि बदमजाज शख्स के अंदर से तकब्बुर को निकालने की कोशिश की जाए, अल्लाह की बड़ाई का इस्तिहजार अजान व अकामत के कलमात का जवाब भी अल्लाह की बड़ाई के तसव्वुर को जेहन नशीन करने में बहुत मआून होता है, बदमजाज शख्स के जेहन में अगर यह बात बिठा दी जाए कि तुम बड़े नहीं हो, अल्लाह बड़ा है और वाकेआ यह है कि ओहदों मुनासिबों की बलंदी पर पहुंचने के बावजूद तुम सब محتाज हो, बेनियाज जात सिर्फ अल्लाह की है तो बदमजाजी दूर हो जाएगी, और लोग बदमजाज की बदमजाजी से महफूज हो जाएंगे।

इफरादी जिंदगी से अलग होकर अगर हम इज्तिमाई तनजीमों और इदारों की बात करें और इस पर किसी बदमजाज शख्स का तसल्लुत हो तो इसकी बदमजाजी के असार इज्तिमाई निजाम पर पड़ते हैं, और इदारों को नुकसान का सामना करना पड़ता है, शरीयत ने इसी वजह से इज्तिमाई कामों में खासतौर पर मशवरे पर जोर दिया है, वशاورहुम फील अम्र, व अम्रुहुम शूरा बैनहुम" का हुक्म इस नुकसान से बचने के लिए है, इस पर जिस कदर मजबूती से अमल होगा, फ़र्द की इस्लाह भी होगी और इज्तिमाई तकाजों पर भी अमल किया जा सकेगा।

बदमजाज शख्स के दिल में सख्ती होती है, उसका दिल सिर्फ उसी के सामने नरम होता है जिससे उसका कोई मफाद वाबस्ता हो या उसे नुकसान का खतरा हो यानी "जल्ब मनफात" और "दफअ मضر" उसकी जिंदगी का मकसद बन जाता है, वह अगर किसी के सामने सरंगो होता है तो नफा का हासिल मदनज़र होता है या नुकसान से बचना, इसके अलावा वह दूसरों को अपनी बदमजाजी की वजह से नफा से महरूम करता रहता है, ऐसे बदमजाज शख्स का इकराम कोई दिल से नहीं करता; बल्कि उसकी मुजिरत रसानी के खौफ और डर से करता है, इसे हदीस में युकरमुर रजुल मखाफतह शर्रिह" से तअबीर किया गया है और जब मामला यहां तक पहुंच जाए तो हदीस में मसلسل और मुतवातिर मुसीबतों के नुजूल की बात कही गई है, बिल्कुल उसी तरह जैसे कि धागा टूट जाने से तسبीह के दाने मसلسل गिरने लगते हैं।

बदमजाज लोगों के साथ खुद बदमजाज बन जाना सही नहीं है, इससे आपकी सोच मनफी बनती है और यह आपके लिए परेशानी का बाइस बनती है, इन हालात में कुरआनी हिदायतें "इदफअ बिल्लती ही अहसन" यानी खुश असलूबी से मुआमलात को टालने की है, ऐसे लोगों को माफ कर देना या उन्हें मोहब्बत के जरिए क़रीब करना भी एक हल है, कुछ लोगों की राय है कि अगर आपके अंदर कुव्वत ए बरदाश्त है तो सब्र भी कर सकते हैं, लेकिन यह बदमजाज शख्स के लिए दवा का नहीं है, मर्ज बढ़ाने का बाइस बन सकता है।

माहिरीन ए नफ्सियात ने इस बात की स्पष्टता की है कि बदमजाजी की बड़ी वजह दूसरों पर गालिब आने की बेजा होस होती है, बदमजाज आदमी अपनी जोरदार आवाज और बुरा भला कहकर दूसरों को मग्लूब कराना चाहता है, आम तौर पर सामने वाला चूंकि बदमजाज नहीं होता; इसलिए वह खामोश रह जाता है, जिससे बदमजाज इंसान का हौसला बढ़ता है और वह अपनी मनवाने पर मुसर्र हो जाता है। आप ऐसे लोगों की बात मानते मानते अपनी शख्सियत खो देते हैं, आपकी फिक्र और सोच भी कहीं गुम हो जाती है, और आपका शुमार उन लोगों में होने लगता है; जिसकी कोई अपनी फिक्र नहीं होती। आपकी खामोशी को लोग आपकी बुजदिली से भी तअबीर कर सकते हैं।

अपनी शख्सियत की حفاظत के लिए दबाव के इस माहौल से निकलना भी जरूरी है, वरना आप दूसरों की देखादेखी और दबाव में बहुत सारे गलत, सही फैसले लेने और कबूल करने पर मजबूर हो जाएंगे, ऐसे मौके से जरूरी है कि आप जज्बात में न आएं, परसुकून रहें, कभी-कभी हंसी मजाक में टाल सकते हों तो टाल दीजिए, अपनी बात खुलकर रखें और अपने तर्ज ए अमल से बता दीजिए कि इज्जत नफ्स मेरे पास भी है और मुझे इसकी حفاظत करना अच्छी तरह आता है।

बदमजाजी, बदअखलाकी का एक हिस्सा है, और बदअखलाकी शरीयत में इंतेहाई मुजम्मम है, बदमजाजी कभी तो खुदपरस्ती की वजह से पैदा होती है और कभी दूसरों को हकीर समझने की वजह से, एक और वजह अपने मकसद और मनसूबों में नाकामी हुआ करती है, आप ने अपना एक हदफ बना रखा है, इस हदफ तक पहुंचने में अगर आप नाकाम हो जाते हैं या इसमें ताखीर हो रही है तो आपके अंदर बदमजाजी पैदा हो जाती है, बदमजाज आदमी के पास सर तो होता है लेकिन इसमें गौर व फिक्र करने वाला दिमाग कमजोर पड़ जाता है, ऐसे में बदमजाज आदमी अंदर ही अंदर जलता रहता है, सुलगता रहता है, इसके जलने और सुलगने का नुकसान दूसरों को तो पहुंचता ही है, खुद इसकी अपनी जात को भी पहुंच जाता है, माचिस की तीली को आपने देखा है इसके पास सर होता है, दिमाग नहीं होता इसलिए जरा सी रगड़ से जल उठता है और अपने जिस्म को खाकستر कर देता है, बदमजाज आदमी का देर सावर यही हाल होता है।

बदमजाजी अपने साथ बहुत सारे मनफी रवैयों को भी साथ लाती है, बदमजाजी की वजह से हसद, जलन, बुग्ज व अदावत, चغل خورी वगैरह इंसानी जिंदगी में घर कर लेते हैं, यह रवैया इंसानी रिश्तों के लिए जहर कातिल होता है, इसका इलाज अपने रवैये में तब्दीली है, जब तक रवैयों में तब्दीली नहीं आएगी, बदमजाजी खत्म नहीं होगी।
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