कलीम हाज़िक अपनी खोयी हुई पहचान के लिए व्यथित और अपने युग के रुझानों का प्रतिनिधि शायर
Awaz E Bihar••12 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
रशीदा मंसूरी होर्डा कलीम हाजिक के फ़न और फ़िक्र का एक व्यापक और संतुलित मरक़ब तबी संभव था जब उनकी सभी रचनाएँ सामने आतीं, ताकि उनकी रचनात्मक दृष्टि और शायराना सौंदर्य को वस्तुगत रूप से एकत्र किया जा सके, ताकि उनका पाठक उनकी रचनात्मक व्यक्तित्व से पूरी तरह जुड़ सके। लेकिन इसके बावजूद, उनके रेख़्ता और फ़ेसबुक से चुने हुए शेरों ने उनकी साहित्यिक व्यक्तित्व के ख़ूबसूरत पहलुओं को सुंदरता से उजागर कर दिया, जिनके प्रकाश में हम कह सकते हैं कि कलीम हाजिक की शायरी इस युग का वह आईना है जिसमें एक संवेदनशील मानव अपनी खोयी हुई पहचान और बिखरे हुए सपनों की तलाश में नजर आता है। उनके फ़न की शुरुआत ही एक ऐसी आशावादिता और विचारधारा से होती है जहाँ वे मिट्टी के कणों को मोती बनाने का हुनर सिखाते हैं और बंजर दिलों में सपने बोने की प्रेरणा देते हैं।
उनके निकट बड़प्पन केवल बाहरी चेहरे और पोशाक की मांग नहीं है, बल्कि असली पारसाई शर्म और आँसुओं से बनती है, क्योंकि जीवन की वास्तविक गर्मी केवल उन लोगों के हिस्से में आती है जो इसे भरपूर प्यार करना जानते हैं। उनके कलाम में सामाजिक लालच की तपिश भी है और तन्हाई के पिंजरे में कैद उदास शामों का नूहा भी, लेकिन वे अपनी अना और स्वाभिमान के उस स्थान पर खड़े हैं जहाँ किसी को बार-बार मनाने की ذलीलत उठाने से बेहतर वे सूरज को अपने स्थान पर रखना जानते हैं।
एक-एक झरे को मोती सा पिरोइए, खेतियाँ फिर खिल उठेंगी सपने बोइए। जबे और दस्तार की शौकत से कब चलता है काम, पारसाई के लिए दामन भिगोइए। जीवन से प्यार है जिन्हें वही हैं सरबुलंद, ऐसे ही दीवानों के अब पाँव धोइए।
कलीम हाजिक की शायरी परंपरा और आधुनिकता का एक ऐसा सुंदर संगम है जहाँ क्लासिकी रचना और आधुनिक भावना एक दूसरे में मिलकर दिखाई देती हैं। तस्लीम अल्लाही ज़ुल्फ़ी के अनुसार, ग़ज़ल जब दरबारों की कृत्रिम वातावरण से निकलकर तप्ती धरती और ग़म-ए-रोज़गार के अनुभवों से गुज़री, तो उसने जीवन की कड़वी सच्चाइयों को अपने अंदर समो लिया; कलीम हाजिक इसी विकासवादी क्रम का एक विश्वसनीय नाम हैं। उनकी ग़ज़ल समय के नमक, मानव जीवन और समाज के विरोधाभासों की अमीन है। कलीम की शायरी की सबसे बड़ी खूबी प्राचीन शब्दावली से स्वतंत्रता और आधुनिक तर्ज़-ए-एहसास की शामिलियत है। उन्होंने किसी की अंधी नकल के बजाय अपनी मंज़िल और सफ़र की दिशा का निर्धारण स्वयं किया है, इसीलिए उनका फ़न एक ऐसे क्लासिकी छतनार पेड़ की तरह है जिसके तने से ताज़ा कोपलें फूट रही हों।
उनके कलाम में एक विशेष प्रकार का हुज़निया आहंग, उदासी और तन्हाई का एहसास मिलता है, लेकिन यह निराशा या हीनता पैदा नहीं करता बल्कि एक गहरी दार्शनिक सोच को जन्म देता है। वे अतीत के बिछड़ने और यादों के ठहरने को जिस फ़नकारी से बयान करते हैं, वह पाठक के दिल पर अंकित हो जाता है। कलीम हाजिक रेत, दरिया, मिट्टी, ज़ंजीर और खुशबू जैसे पारंपरिक استعارों को नए अर्थ देने में माहिर हैं। उनके यहाँ व्यक्तित्व की पहचान और अना का मसला बहुत महत्व रखता है और वे मानव मनोविज्ञान के जटिल पहलुओं को निशानों के ज़रिए स्पष्ट करने का हुनर जानते हैं।
कलीम हाजिक का संग्रह "खुशबू की सवारी" महज़ शब्दों का संग्रह नहीं है बल्कि रक्त की तपिश और विचार की गहराई का प्रतीक है। इसमें क्रur की वादियों में कैद मानवता की आवाज़ और कड़वी सच्चाइयों का बेबाक़ अभिव्यक्ति शामिल है। उनकी शायरी के विभिन्न रंगों में कहीं यादों का दर्द "ख़रोंचता है वह तुम्हारी यादों का" के रूप में उभरता है, तो कहीं "नहीं चलता है ज़ोर उसका किसी सरकश हवा पर" जैसे मिसरों में संकल्प और दृढ़ता की लहर दौड़ती दिखाई देती है। वे सामाजिक रुझानों का प्रतिबिंब करते हुए बताते हैं कि कलमा-е-हक़ तो सभी की ज़बान पर है लेकिन सच्चाई का समर्थन में लोग नहीं आते।
उनके यहाँ व्यक्तित्व और ब्रह्मांड का संघर्ष उस चरम पर है जहाँ मानव अपने ही घर को आग लगाने या अपनी कश्ती में स्वयं छेद करने की बात करता है। नींद से उठकर अपना चेहरा देख रहे हैं, कौन आया है शहर में, सब आइना देख रहे हैं। हवेली बन गई मस्मार, घर को तोड़ दिया। मकानों ने बाज़ार बना दिया घर को। वही रहता है तन्हा भीड़ में भी, वही जो सच हमारा बोलता है। समझ लेता है दिल उसका इशारा ख़ामोशी में भी चेहरा बोलता है।
कलीम हाजिक का यह लहज़ा दरअसल आधुनिक ग़ज़ल का वह वैभव है जो हमें बताता है कि जब परंपरा की थकान सपनों से ज़्यादा बढ़ जाए तो शायर की दृष्टि ही वह एकमात्र दरवाज़ा है जो बीमार घरों को जीवन की ताज़ा हवा से परिचित करा सकती है। उनके अशआर क