मातृभाषा, माँ की पहचान: शमीम अहमद की जुबानी उर्दू की दास्तान
Awaz E Bihar••3 व्यूज़•5 मिनट पढ़ें
मातृभाषा पर मृत्यु का सन्नाटा क्यों है?
लेखक : मुहम्मद फारूक कहते हैं इंसान की पहचान माँ की गोद में बनती है, और उसकी भाषा का निर्धारण भी माँ ही करती है। वह आवाज जो बचपन में कानों में रस घोलती है, वह शब्द जो माँ प्यार से दोहराती है, वही हमारी मातृभाषा है। यह केवल बोलचाल का साधन नहीं है, अस्तित्व की आधारशिला है, संस्कृति का आईना है और विचारों की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति है। यह वह अमानत है जो हमें पूर्वजों से मिली, और यह हमारा कर्तव्य है कि इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएं। जब हम अपनी मातृभाषा में बात करते हैं तो दिल के सबसे गहरे भाव भी बेसाख्ता निकल आते हैं। यही वजह है कि दुनिया भर में 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है, ताकि इंसान अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और अपनी भाषा की मिठास को न भूले। लेकिन अफसोस! आज सवाल यह है कि मातृभाषा पर मौत का सन्नाटा क्यों छाया है? उर्दू अकादमी क्यों खामोश है? जब स्कूल शिक्षकों से खाली हों और अकादमी बेहिसी की चादर ओढ़ ले, तो हम किस मुहं से मातृभाषा दिवस मनाएंगे? इस विशेष अवसर पर हम पश्चिम बंगाल के एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहे हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा उर्दू के लिए न केवल आवाज उठाई, बल्कि पूरे आंदोलन को अपने कंधों पर उठा लिया। यह शख्सियत हैं शमीम अहमद, जिन्हें उर्दू वाले प्यार से 'कायद-ए-उर्दू' कहते हैं। उन्होंने दिखा दिया कि अगर जज्बा हो तो एक आम आदमी भी क्या कुछ कर सकता है। बात उन दिनों की है जब पश्चिम बंगाल की लगभग एक करोड़ उर्दू आबादी अपनी भाषा का हक दिलाने को तरस रही थी। अनजुमन तरक्की-ए-उर्दू और सरकार के बीच आंख मिचौली जारी थी। वादे किए जाते और फिर मुकर जाते। इसी दौरान शमीम अहमद ने ठान लिया कि अब बस बहुत हुआ। शमीम अहमद खुद बताते हैं कि वे न तो उर्दू के प्रोफेसर थे, न बड़े अदीब या शायर। बिल्कुल आम आदमी थे, रोजमर्रा की तरह दिल्ली से कोलकाता आए। एक दोस्त ने धर्मतला में होने वाली उर्दू कॉन्फ्रेंस में चलने को कहा, तो वे एक आम श्रोता की तरह पहुँच गए। वहाँ घोषणा हुई कि सरकार उर्दू को दूसरी सरकारी भाषा बनाने पर राजी है। उन्होंने भी दूसरों की तरह खुशी मनाई, अखबारों में बधाई दी। लेकिन कुछ दिनों बाद पता चला कि यह सब झूठ था, सरकार ने साफ इनकार कर दिया। उस दिन वे समझ गए कि यह कोई खेल नहीं है, साजिश है और उनकी भाषा के साथ धोखा हो रहा है। दिल में गुस्सा था, दर्द था, तब उन्होंने तय किया कि अब किसी के पीछे नहीं भागना, अपनी मेहनत से नई शुरुआत करनी है। यह वह दौर था जब वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) की सरकार अपने शिखर पर थी और 2006 में उसे शानदार जीत मिली थी। ऐसे में सरकार के खिलाफ आवाज उठाना आसान नहीं था। शमीम अहमद के अपने लोग भी डरते, समझाते, मगर वे डटे रहे। उनका यकीन था कि जब खुदा ने दिल में यह जज्बा डाला है तो वही मदद करेगा। शमीम अहमद ने अकेले यह मुहिम छेड़ दी। गाँव-गाँव, शहर-शहर लोगों से मिले। 2012 में कोलकाता के मेट्रो चैनल पर हजारों का जमावड़ा हुआ, फिर यह आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर तक जा पहुँचा। लोगों का जोश देखने लायक था। अंततः यह आंदोलन रंग लाया और बंगाल विधानसभा में उर्दू को दूसरी सरकारी भाषा बनाने का बिल पास हुआ। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बिल पास होने के बाद नौ महीने तक राज्यपाल के हस्ताक्षर का इंतजार रहा। फिर से आंदोलन हुए, नादिर शाह के मकबरे के सामने प्रदर्शन किए गए। बालآخر वह दिन आया जब राज्यपाल ने हस्ताक्षर किए और उर्दू को उसका हक मिल गया। उस दिन शमीम अहमद ने घोषणा की कि उनका उद्देश्य पूरा हो गया, अब उर्दू की तरक्की की जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो इस भाषा में पढ़े-लिखे हैं, जो लाखों कमा रहे हैं, जो शायर और अदीब हैं। अब सवाल यह है कि इन 12-14 सालों में क्या बदला? क्या उर्दू सच में तरक्की कर पाई? विश्व मातृभाषा दिवस पर शमीम अहमद ने फिर उसी दर्द भरी आवाज में कहा कि हालात पहले से बदतर हैं। वे बताते हैं कि जब वाम सरकार थी, उर्दू को सरकारी दर्जा नहीं था, मगर स्कूलों में शिक्षक थे, पढ़ाई का माहौल था। आज सरकारी दर्जा मिलने के बाद उर्दू स्कूल शिक्षकों से खाली हो चुके हैं। हजारों पद खाली हैं, भर्ती नहीं हो रही है। शमीम अहमद ने उर्दू अकादमी के कामकाज पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि पहले जो चेयरमैन होते थे, वे उर्दू के बड़े नाम होते थे, जिन्हें भाषा की बारीकियों का पूरा ज्ञान था। आज अकादमी में ऐसे लोगों को बैठा दिया गया है जिनका उर्दू से दूर का भी वास्ता नहीं है। वे सवाल करते हैं कि क्या बांग्ला अकादमी में किसी ऐसे व्यक्ति को जगह मिल सकती है जो बांग्ला नहीं ज