वंदे मातरम: इतिहास की कल्पना और राजनीति की वास्तविकता
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लेख: यूसुफ शम्सी
वंदे मातरम की सौ पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर संसद में इसकी गूंज और बाहर बढ़ती तनाव ने एक बार फिर इतिहास और वर्तमान के बीच जारी बहस को जीवित कर दिया है। सवाल यह है कि क्या ऐतिहासिक विवादों की राजनीति ने सामाजिक सौहार्द को और कमजोर कर दिया है? संसद में वंदे मातरम पर हुई दस घंटे लंबी चर्चा से आखिर क्या हासिल हुआ? क्या किसी ने कोई सबक सीखा? क्या देश में कहीं भी सौहार्द, परस्पर सम्मान और साझा विरासत को समझने और समझाने का कोई माहौल बना? शासक दल, और विशेष रूप से भाजपा, इस बात से खुश दिखाई दे रही है कि उसने कांग्रेस पार्टी और जवाहरलाल नेहरू पर बदनामी का एक और दाग लगा दिया और उन पर यह आरोप लगा दिया कि जैसे देश के विभाजन की तरह वंदे मातरम को भी विभाजित करने के जिम्मेदार वे ही हैं। वह इस बात से भी संतुष्ट है कि उसे अल्पसंख्यक वर्ग पर, विशेष रूप से मुसलमानों पर, एक ऐसा गीत थोपने का बहाना मिल गया है जिसे मुस्लिम समाज शिर्क मानता है। दूसरी ओर कांग्रेस और विपक्ष इस बात से खुश हैं कि उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास के विवादित हिस्सों को उठाकर भारतीय एकता को नुकसान पहुंचा रहे हैं, और चूंकि संघ परिवार की सीधी भागीदारी आजादी की लड़ाई में नहीं रही, इसलिए वे इस विरासत की कुछ जमीन अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष ने यह भी साबित किया कि भाजपा एक बार फिर लॉर्ड कर्जन की तरह बंगाल के चुनावों को निशाना बनाते हुए उसे विभाजित करने की कोशिश कर रही है, यानी भाजपा एक नए बंग भंग की योजना बना रही है। लगता है कि हमायूं कबीर के मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास और संसद में वंदे मातरम पर चर्चा के बाद नए पश्चिम बंगाल में दूसरे बंग भंग की तैयारी हो चुकी है।
इतिहास की कल्पना बनाम कल्पना का इतिहास: इस चर्चा में कई वक्ताओं ने इसे अप्रासंगिक बताते हुए भी कुछ बातें कहीं, जिनका सार यह था कि राजनीति को इतिहास के विवादों में उलझने के बजाय वर्तमान की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। राजनीति इतिहास के टुकड़े-टुकड़े कर वर्तमान को विकृत कर रही है। यहां एक इतिहासकार की बात याद आती है कि इतिहास के विवादों को इतिहासकारों के लिए छोड़ देना चाहिए। सच्चाई यह है कि इतिहास स्वयं एक कल्पना है, और इसे सच या वास्तविकता से साबित करने की कितनी ही कोशिशें की जाएं, वह कल्पना से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकता। हर इतिहास में कल्पना का तत्व होता है और हर कल्पना की अपनी एक इतिहास होती है। दूसरी ओर कल्पनाओं की भी अपनी इतिहास होती है, और जब वे इतिहास का हिस्सा बनते हैं तो इतिहास और राजनीति को और जटिल बना देते हैं। वंदे मातरम के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला है। यह मुद्दा भाजपा बनाम कांग्रेस से ज्यादा इतिहास की कल्पना बनाम कल्पना का इतिहास है। भारत की आजादी की लड़ाई में नारों और बयानों के रूप में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिन्हें यदि खुले दिल से देखा जाए तो वे जोड़ने का काम करती हैं, और यदि संकीर्ण राष्ट्रवाद के साथ उनकी व्याख्या की जाए तो वे विभाजन का कारण बनती हैं। वंदे मातरम भी इसी श्रेणी में आता है। वंदे मातरम और इससे जुड़े उपन्यास 'आनंदमठ' संन्यासी विद्रोह जैसी एक ऐतिहासिक वास्तविकता की कल्पनात्मक प्रस्तुति है।
संन्यासी विद्रोह की वास्तविक सच्चाई पर खामोशी: इस उपन्यास और इस गीत के माध्यम से प्रस्तुत की गई बंग माता की मानवीय छवि भारतीय राष्ट्रवाद की कल्पना में इस तरह रच-बस गई है कि अब संन्यासी विद्रोह की वास्तविक सच्चाई पर चर्चा नहीं होती, बल्कि इससे उत्पन्न भारत माता के स्त्री रूप पर ही बात की जाती है। संसद में बंकिम चंद्र चटर्जी को महान कवि और लेखक बताने वाले यह बताना भूल गए कि बंकिम ने एक साझा विरासत के विद्रोह को सांप्रदायिक रंग दे दिया। बंकिम अंग्रेजों के कर्मचारी थे और उन्होंने इस उपन्यास के माध्यम से अंग्रेजी शासन के औचित्य को साबित करने की कोशिश की। यह भी याद दिलाना जरूरी है कि बंकिम ने अंग्रेजों के खिलाफ 'साम्य' नामक एक लेख लिखा, मगर बाद में उसे वापस ले लिया। लेकिन इतिहास किसी की कल्पनाओं में कैद नहीं रहता। अंग्रेजों के पक्ष में लिखे गए इस उपन्यास का यही गीत बाद में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का नारा बन गया। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि बंकिम ने अंग्रेजों के टूڈी मीर जफर के खिलाफ होने वाले इस विद्रोह को मुस्लिम शासन के खिलाफ विद्रोह साबित कर दिया, जिसमें भवानी पाठक, देवी चौधरानी, मजनू शाह, मूसा शाह और चिराग अली एक साथ लड़े थे। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि एक कल्पनात्मक गीत स्वयं इतिहास की एक जीवंत वास्तविकता बन गया।