डॉक्टर मुज़फ्फर हुसैन गज़ाली बिहार विधानसभा चुनाव हमारे देश के चुनावी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह चुनाव विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) के आधार पर 25 जून को जारी की गई मतदाता सूची के परिप्रेक्ष्य में, जिसमें एनडीए को ऐतिहासिक जीत मिली। एसआईआर की सभी खामियों को नजरअंदाज करते हुए, बिहार में वयस्क मतदान के लिए नए नियम बनाए गए। संविधान सभा में हुई चर्चाओं में एक ऐसे लोकतांत्रिक प्रणाली का विचार प्रस्तुत किया गया था जो "लोगों की सरकार, लोगों के लिए और लोगों द्वारा" हो। चुनावी लोकतंत्र इसका आधार था। यह स्वतंत्रता संग्राम की उस विरासत पर आधारित था जिसने नागरिक को इसका आधार बनाया था। भारत के प्रत्येक नागरिक को एक वोट का अधिकार दिया गया, चाहे उसकी जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति या जाति कुछ भी हो। इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए, देश के चुनाव आयोग को एक मजबूत और स्वतंत्र संवैधानिक संस्था का दर्जा दिया गया था। इससे उम्मीद थी कि वह दो मूलभूत सिद्धांतों के माध्यम से नागरिकों को अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला करने में मदद करेगा। पहला यह कि मतदाता सूची स्वयं चुनाव आयोग तैयार करेगा और इसे राजनीतिक दलों या सरकारों की कृपा पर नहीं छोड़ा जाएगा। इसलिए, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी थी, किसी एक नागरिक पर यह बोझ नहीं डाला गया था। दूसरा यह कि भारत के नागरिक मतदाता सूची में शामिल होंगे, लेकिन आयोग को नागरिकता तय करने के काम से अलग रखा गया था। यदि कोई विवाद होता है, तो इसे गृह मंत्रालय से परामर्श के बाद हल किया जाना था। बिहार में पहली बार एसआईआर दोनों मूल सिद्धांतों से हट गया। एसआईआर के अनुसार, मतदाताओं को एक फॉर्म भरना था और मतदाता सूची में अपने नाम की पुष्टि करनी थी, और यदि कोई विवाद नहीं भी होता तो भी उन्हें मतदान की पात्रता साबित करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा बताए गए दस्तावेज प्रस्तुत करने थे। इस प्रकार दूसरा सिद्धांत भी टूटने लगा क्योंकि चुनाव आयोग द्वारा बताए गए दस्तावेज कुछ हद तक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़नशिप (एनआरसी) की आवश्यकताओं से मिलते जुलते थे, जैसा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम की भावना में कल्पना की गई थी। इससे वह पूरा विवाद भी चुपचाप फिर से जीवित हो गया जो पहले ही भड़क चुका था और कठिन प्रश्नों के कारण रुका हुआ था। बिहार में इसका जोरदार विरोध हुआ और पूरे देश में चर्चा छिड़ गई। असल समस्या यह थी कि नागरिकता साबित करने के लिए कोई एकमात्र प्रामाणिक दस्तावेज मौजूद नहीं था। प्रस्तावित एसआईआर विदेशी, फर्जी और डुप्लिकेट वोटों को छानने के नाम पर किया गया था। जबकि एसआईआर की प्रक्रिया भाजपा की पसंद के मतदाता चुनने की ओर इशारा करती है। यदि मामला विदेशी, फर्जी या डुप्लिकेट वोटों को हटाने का होता तो किसी को आपत्ति नहीं होती, लेकिन जीवित लोगों के वोट मृत बताकर काट देना। प्रवासी मजदूरों, जिनकी संख्या बिहार में बहुत अधिक है, कम समय के कारण वे अपने नाम दर्ज करने में असफल रहे। महिलाओं, दलित और कमजोर वर्गों के मतदाताओं के नाम हटाने की दर में भी काफी वृद्धि देखी गई। सीमाई जिलों में अल्पसंख्यक धर्मों के मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटा दिए गए। स्पष्ट रूप से इस प्रक्रिया से मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को गंभीर आघात पहुंचा और समाज में संदेह पैदा हुआ। चुनाव आयोग यह नहीं बता सका कि एसआईआर में कितने विदेशी मतदाता मिले। वह यह बताने से भी इनकार कर रहा है कि नागरिकता और मतदाता सूची के बीच कोई संबंध है। लेकिन इसके फोकस से यह स्पष्ट हो गया है कि यह मतदाता सूची की गलतियों को ठीक करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर बाहर निकालने और मतदान से वंचित करने का हथकंडा है। ड्राफ्ट और फाइनल सूची, दोनों ने विवाद को और बढ़ा दिया और मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी देखी गई। एसआईआर के साथ-साथ चुनाव आयोग के रवैये पर उठे सवालों ने और चिंता बढ़ा दी। इसके प्रदर्शन से स्पष्ट हो गया है कि यह इसकी अक्षमता, पारदर्शिता की कमी के अलावा शासक दल को लाभ पहुंचाने के लिए स्पष्ट पक्षपात थी। जिसे विपक्ष ने मत चोरी कहा। विपक्ष की कड़ी आलोचना के बावजूद भाजपा सरकार ने तैयारी और बीएलओ की औपचारिक प्रशिक्षण के बिना मनमाने तरीके से नोटबंदी की तरह वोटबंदी का अभियान 12 राज्यों में शुरू कर दिया। इस काम को पूरा करने के लिए इतना दबाव बनाया गया कि बीएलओ और उनसे ऊपर के 30 अधिकारियों की जान चली गई। लेकिन सरकार और चुनाव आयोग के कान पर जूं नहीं रेंगी। एसआईआर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों में भी किया जा रहा है। वहां इतनी जल्दी क्यों दिखाई जा रही है जब उन राज्यों में अगले साल चुनाव नहीं होने वाला है। यहां अधिक समय दिया जा सकता था। लेकिन असम जहां अगले साल चुनाव होना है, वहां एसआईआर नहीं किया जा रहा है। बंगाल में भाजपा स्वयं एसआईआर पर सवाल उठा रही है। जबकि चुनाव आयोग केंद्र सरकार की मर्जी के अनुसार काम कर रहा है। विपक्ष इस मामले में सहमत है, वह संसद में चुनाव आयुक्त के महाभियोग का प्रस्ताव लाना चाहती थी। सरकार ने गणेश कुमार को बचाने के लिए विपक्ष के संसद में चर्चा कराने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। अब 8-9 दिसंबर को एसआईआर के बजाय चुनाव सुधार पर संसद में चर्चा होगी। माना जा रहा है कि चुनाव सुधार के परिप्रेक्ष्य में एसआईआर पर भी बात होगी। वैसे, विपक्ष के एसआईआर पर तीव्र प्रतिक्रिया के कारण एसआईआर के समय एक सप्ताह का विस्तार किया गया है। यहां इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि सर्वोच्च न्यायालय में एसआईआर के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। उसने चुनाव आयोग को सलाह तो दी, लेकिन कोई फैसला नहीं दिया। जबकि वह संविधान का संरक्षक है और उसे चुनाव आयोग की नीतियों को रद्द करने का अधिकार हासिल है। भाजपा एसआईआर के माध्यम से कमजोर वर्गों में भय, अनिश्चितता पैदा करना और भीड़ का फायदा उठाना चाहती है। साथ ही वह छोटे दलों के वोट अपने साथ लाकर चुनाव जीतने के लिए योजना पर काम कर रही है। इसमें एसआईआर का हथियार काफी कारगर साबित हुआ है। ऐसे में विपक्ष, विशेष रूप से इंडिया ब्लॉक से जुड़े दलों को इससे निपटने के तरीकों पर विचार करना चाहिए। साथ ही अपने गठबंधन का लेखा जोखा करना होगा कि सहयोगी दल एक दूसरे से कितने संतुष्ट हैं। शासक दल के कार्यकर्ता बीएलओ के साथ अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में लगे हुए हैं और विपक्ष शोर मचा रहा है। उसे अपने कार्यकर्ताओं को इस प्रक्रिया में लगाना चाहिए ताकि किसी भी नागरिक का वोट काटने न पाए। यद्यपि कई वास्तविक मुद्दे ऐसे हैं जिन्होंने सामान्य लोगों के जीवन और रोजगार को प्रभावित किया है, लेकिन विपक्ष उन पर जनमत को प्रभावी ढंग से आकार देने में विफल रही है। उसे अपना एजेंडा स्पष्ट करना चाहिए ताकि शासक गठबंधन को कड़ी चुनौती दी जा सके। विपक्ष का भविष्य इसमें है कि जन समस्याओं पर फिर से मजबूत आंदोलन चलाए जाएं और सरकारी चालबाजी और सामूहिक रूप से हिंदू राष्ट्रवादी निगमों के हमलों के खिलाफ निरंतर राजनीतिक संघर्ष किया जाए। एक निष्पक्ष चुनावी प्रणाली और न्यायपूर्ण लोकतंत्र के लिए संघर्ष ऐसी निरंतर प्रयास की मांग करता है। शासक दल भाजपा ने एसआईआर के माध्यम से अपनी मंशा और योजना स्पष्ट कर दी है। अब विपक्ष की बारी है जनता को यह बताने की कि वे कैसे उनके जीवन को बेहतर बना सकते हैं।