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यमन की धरती, खाड़ी के जख्म दो दोस्त, एक मोर्चा और बारूद की जुबान
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यमन की धरती, खाड़ी के जख्म दो दोस्त, एक मोर्चा और बारूद की जुबान

Awaz E Bihar•31 दिसंबर 2025 को 01:02 pm बजे•1 व्यूज़•5 मिनट पढ़ें

लेख: सैयद आसिफ इमाम काकवी दुबई
वर्ष 2025 अपने अंतिम क्षणों में प्रवेश कर चुका है, लेकिन दुनिया शांति के बजाय एक नए तनाव के साथ इस वर्ष को अलविदा कह रही है। यमन की घायल धरती फिर से वैश्विक राजनीति के केंद्र में है, जहां इस बार निशाने पर कोई गैर-राज्य समूह नहीं बल्कि खाड़ी के दो करीबी सहयोगी, दो पुराने मित्र सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।

सुबह की पहली अजान के साथ ही यमन की हवा में धमाकों की गूंज सुनाई दी। मोका बंदरगाह पर हुआ सऊदी हवाई हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह खाड़ी की राजनीति में एक गहरी दरार का एलान था। कुछ ही घंटों बाद रियाद से आया संदेश पूरी दुनिया ने सुना: संयुक्त अरब अमीरात 24 घंटों के भीतर यमन से अपनी सभी सेनाएं वापस बुलाएं। यह बयान कूटनीतिक लहजे में लिपटा हुआ कोई औपचारिक वाक्य नहीं था, बल्कि एक सख्त चेतावनी थी।

सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा एक लाल रेखा है, और इस रेखा को पार करने की अनुमति किसी करीबी मित्र को भी नहीं दी जा सकती। सऊदी अरब का मानना है कि मोका बंदरगाह पर अमीराती जहाजों के माध्यम से भारी मात्रा में हथियार, बख्तरबंद गाड़ियां और सैन्य उपकरण उतारे जा रहे थे, जो दक्षिण यमन में सक्रिय अलगाववादी संगठन साउथर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल (एसटीसी) को मजबूत करने के लिए थे।

रियाद के अनुसार यह न केवल युद्धविराम और तनाव कम करने के समझौतों का खुला उल्लंघन है, बल्कि सऊदी सीमाओं के पास एक नए खतरे की तैयारी भी है। दूसरी ओर, संयुक्त अरब अमीरात की खामोशी खुद एक सवाल बन गई है। हालांकि शुरुआत में आरोपों का खंडन किया गया, लेकिन शाम होते ही यमन से पूर्ण सैन्य प्रत्याहार के एलान ने इस संकट को एक नए मोड़ पर ला दिया।

यहां सवाल यह नहीं है कि हमला क्यों हुआ, बल्कि सवाल यह है कि वे मित्र जो वर्षों तक एक ही मोर्चे पर खड़े रहे, अचानक एक दूसरे के लिए खतरा कैसे बन गए? यमन का युद्ध वास्तव में एक युद्ध नहीं है, बल्कि कई युद्धों का संग्रह है। यह कहानी 2011 के अरब वसंत से शुरू होती है, जब यमन के लोग सड़कों पर उतरे और दशकों से सत्ता में बैठे अली अब्दुल्लाह सालेह को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया।

उनके बाद अब्दुरब्बuh मनसूर हादी को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया गया, लेकिन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई ने लोगों की उम्मीदों को जल्द ही निराशा में बदल दिया। इस खालीपन में हौथी आंदोलन ने शक्ति प्राप्त की और राजधानी صنعा पर कब्जा कर लिया। आश्चर्यजनक रूप से पूर्व राष्ट्रपति सालेह ने अपने पुराने दुश्मन हौथियों का साथ दिया।

2015 में हालात इस नज पर पहुंचे कि सऊदी अरब ने सैन्य हस्तक्षेप का फैसला किया और यमन में एक व्यापक अरब गठबंधन के साथ हवाई हमले शुरू कर दिए, जिन्हें अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का समर्थन मिला। सऊदी अरब को डर था कि उसकी दक्षिणी सीमा पर ईरान के समर्थक हौथियों की सरकार स्थापित हो जाएगी, और बाब अल-मंदब जैसे महत्वपूर्ण जलमार्ग उसके नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।

यही वजह थी कि यमन पर कड़ा समुद्री और हवाई नाकाबंदी लगाई गई, जिसका खामियाजा आम यमनी लोगों ने भुगता। ईंधन, भोजन और दवाओं की गंभीर कमी ने यमन को दुनिया के सबसे खराब मानवीय संकट में बदल दिया। लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हुए, अस्पताल बंद हो गए, और एक पूरा समाज जीवित रहने के संघर्ष में अकेला छोड़ दिया गया।

इस बीच यमन के दक्षिण में एक और मोर्चा खुल गया। संयुक्त अरब अमीरात ने दक्षिणी अलगाववादियों का समर्थन शुरू किया, जो एक अलग दक्षिण यमन का सपना देख रहे थे। यहां से सऊदी अरब और यूएई के रास्ते धीरे-धीरे अलग होने लगे। एक एकीकृत यमन बनाम एक विभाजित यमन यही मूलभूत मतभेद आज खुले संघर्ष में बदल चुका है।

हाल की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि खाड़ी की राजनीति में गठबंधन स्थायी नहीं होते, बल्कि हितों के अधीन होते हैं। जब हित टकराते हैं, तो मित्र दुश्मन बन जाते हैं, और युद्ध का मैदान किसी और का होता है। सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि इन सभी निर्णयों, बयानों और बमबारी की कीमत हमेशा आम आदमी चुकाता है।

यमन की वह मां जो अपने बच्चे को भूख से मरते देख रही है, वह बुजुर्ग जो दवा के बिना दम तोड़ रहा है, और वह युवा जिसके पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं है यही इस युद्ध का असली चेहरा है। आज यमन की धरती फिर से गवाह है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़े जाते, बल्कि निर्णयों, घड़ी की सुइयों और राजनीतिक बयानों के माध्यम से भी लड़े जाते हैं।

सुबह का हमला, दोपहर का अल्टीमेटम और शाम का प्रत्याहार यह सभी इस बात का प्रमाण हैं कि शक्तिशाली देशों के एक दिन के निर्णय कमजोर राष्ट्रों की दशकों पर फैली तक
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